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Samtva Health


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Samtva उन लोगों के लिए सर्वोत्तम है जिन्हें स्वास्थ्य के बारे में अपने आप को अपडेट करने की आवश्यकता है।

जब से मानव सभ्यता का विकास हुआ, तभी से स्वास्थ्य वैज्ञानिक, चिकित्सक तथा चिंतक इस प्रयास में व्यस्त हैं कि मानव रोग मुक्त जीवन कैसे जी सके ? यथार्थता यह है कि, इतनी प्रगति के बावजूद भी आज रोग और रोगियों की संख्या में उत्तरोतर वृद्धि होती जा रही है। मानव शरीर के लिये अति आवश्यक कोशिकाओं, रक्त, वीर्य, अस्थि, मज्जा आदि किसी भी शारीरिक अवयव का आज तक प्रयोगशालाओं में निर्माण नहीं हो सका है।

दुनियाँ में चेतनाशील प्राणियों में मानव का प्रतिशत तो एक प्रतिशत से भी कम होता है । बाकी 99 प्रतिशत जीव अनादि काल से सहज जीवन जी रहे हैं, जिन्हें किसी भी प्रकार की चिकित्सा पद्धति का, न तो कोई ज्ञान होता है और न अनुभवी चिकित्सकों का सान्निध्य ही मिलता है। क्या वे रोगी नहीं होते? वे पुन: कैसे स्वस्थ होते हैं? दूसरी तरफ स्वच्छ वातावरण में रहने वाले, पौष्टिक आहार का सेवन करने वाले, शुद्ध निर्मल मिनरल वाटर पीने वाले भी रोगी हो जाते हैं। आखिर क्यों ? इस पर बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सम्यक् चिन्तन आवश्यक है।

मानव शरीर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मशीनरी है जो पांचों इन्द्रियों और मन जैसी अमूल्य सम्पदाओं से न केवल परिपूर्ण ही होता है अपितु, उसके सारे अंग - उपांग पूर्ण तालमेल एवं आपसी सहयोग एवं समन्वय से अपना अपना कार्य करते हैं। यदि शरीर के किसी भी भाग में कोई तीक्ष्ण कांटा, सुई अथवा पिन चुभ जाए तो उस समय न तो आँख को अच्छे से अच्छा दृश्य देखना अच्छा लगता है और न, कानों को मन पसन्द गीत सुनना। यहां तक दुनिया भर में चक्कर लगाने वाला हमारा चंचल मन क्षण मात्र के लिए अपना ध्यान वहां केन्द्रित कर देता है। जिस शरीर में इतना तालमेल और अनुशासन हो, क्या उस शरीर में कोई अकेला नामधारी रोग उत्पन्न हो सकता हैं? मानव शरीर अपने आप में परिपूर्ण है। इसमें अपने आपको स्वस्थ रखने की पूर्ण क्षमता होती है।

शरीर में हजारों रोग होते हैं, परन्तु अधिकांश चिकित्सा पद्धतियाँ आज निदान करते समय उनकी उपेक्षा कर मुख्य रोग को ही प्रधानता देती हैं। जनतंत्र में सहयोगियों को अलग किये बिना जिस प्रकार नेता को नहीं हटाया जा सकता, सेना को जीते बिना सेनापति को कैद नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार सहयोगी रोगों की उपेक्षा कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त नहीं रखा जा सकता। यह सनातन सत्य है तथा उसको नकारने एवं उपेक्षा करने वाली चिकित्सा आंशिक, अधूरी एवं अस्थायी ही होती है। यह रोगों एवं लक्षणों के नाम से उपचार करने वाली पद्धतियों के प्रशंसक स्वास्थ्य प्रेमियों के लिए चुनौती भरा चिन्तन का प्रश्न है तथा स्वास्थ्य के संबंध में हमारे पूर्वाग्रहों से ग्रसित मान्यताओं पर पुनर्विचार करने हेतु प्रेरित करता है।

हमारे शरीर में स्वयं को स्वस्थ रखने की क्षमता होती है। अनुभवी चिकित्सक एवं अच्छी से अच्छी दवा शरीर को अपना उपचार स्वयं करने की प्राकृतिक विधि में सहायक मात्र होते हैं। शरीर के सहयोग के बिना सारे उपचार निष्क्रिय हो जाते हैं।

प्रत्येक मनुष्य स्वस्थ रहना चाहता है, परन्तु चाहने मात्र से तो स्वास्थ्य नहीं मिलता। उपचार से पूर्व रोगी को यह जानना और समझना आवश्यक है कि रोग क्या है ? रोग कब और क्यों होता है ? उसके प्रत्यक्ष परोक्ष कारण क्या क्या हो सकते हैं ? रोग के सहायक एवं विरोधी तत्त्व क्या हैं ? व्यक्ति रोग तो स्वयं पैदा करता है, परन्तु दवा और डाक्टर से ठीक करवाना चाहता है। क्या उसका श्वास अन्य व्यक्ति ले सकता है ? क्या उसका खाया हुआ भोजन दूसरा व्यक्ति पचन कर सकता है ? प्रकृति का सनातन सिद्धान्त है कि जहाँ समस्या होती है, उसका समाधान उसी स्थान पर होता है। अत: जो रोग शरीर में पैदा होते हैं, उनका उपचार शरीर में अवश्य होना चाहिये। यही स्वावलम्बी चिकित्सा का मूल सूत्र है।

अधिकांश व्यक्ति रोग होने में स्वयं की गलती स्वीकार नहीं करते । इसी कारण रोग के कारणों को समझे बिना, निदान के बारे में अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त किये बिना, डाक्टरों के पास पड़ने वाली भीड़ के अन्धानुकरण के कारण, चिकित्सा से भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों की उपेक्षा करते हुए, अपने आपको डाक्टरों की प्रयोगशाला बनाते प्राय: संकोच नहीं करते। दवाओं के अनावश्यक सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति क्षीण होने लगती हैं। रोग के जितने मानसिक और भावात्मक कारणों के साथ साथ प्रकृति के विरुद्ध खान-पान , रहन-सहन, आचार-विचार से संबंधित कारण स्वयं को ज्ञात होते हैं, उनको रोगी पूर्णत: अभिव्यक्त नहीं कर सकता। जितने कारण अभिव्यक्त कर सकता है, वे सारे के सारे यंत्रों एवम् पेथालोजिकल परीक्षणों की पकड़ में सदैव नहीं आते । अत: निदान प्राय: अधूरा ही होता है। जब निदान ही अधूरा हो, जिसमें रोग के मूल कारणों की उपेक्षा हो तो, ऐसे उपचार कैसे स्थायी हो सकते हैं? आज उपचार किया जाता है, परन्तु वास्तव में होता नहीं। मात्र पीड़ा में राहत मिलना अथवा रोग के बाह्य कारणों का दब जाना, रोग का सम्पूर्ण उपचार नहीं माना जा सकता।

हमे चिन्तन करना होगा कि जो शरीर अपनी कोशिकाएँ रक्त, मांस, मज्जा, हड्डियाँ, चर्बी, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण स्वयं करता है, जिसे आधुनिक विकसित स्वास्थ्य विज्ञान पूरी कोशिश के बावजूद अभी तक नहीं बना सका। ऐसे स्वचालित, स्वनिर्मित, स्वनियन्त्रित शरीर में स्वयं के रोग को दूर करने की क्षमता न हों, यह कैसे संभव है?

 शरीर का विवेक पूर्ण एवं सजगता के साथ उपयोग करने की विधि स्वावलम्बी जीवन की आधारशिला होती है। मानव की क्षमता, समझ और विवेक जागृत करना उसका उद्देश्य होता है। उपचार में रोगी की भागीदारी मुख्य होती है। अत: रोगी उपचार से पड़ने वाले प्रभावों के प्रति अधिक सजग रहता है, जिससे दुष्प्रभावों की सम्भावना प्राय: नहीं रहती। ये उपचार बाल-वृद्ध , शिक्षित-अशिक्षित , गरीब अमीर, शरीर विज्ञान की विस्तृत जानकारी न रखने वाला साधारण व्यक्ति भी आत्म विश्वास से स्वयं कर सकता हैं। हमारा उद्देश्य जनसाधारण में फैली भ्रामक धारणाओं को दूर कर स्वयं की असीम क्षमताओं के प्रति स्वयं का आत्म विश्वास पैदा करना है ताकि मानव को विश्वास हो सके कि- “स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावशाली होती हैं।

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