PRANAYAM IN HINDI

 प्राणायाम करने की प्रक्रिया, ओर प्राणायाम करने के लाभ


प्राणायाम क्या है ? 

          प्राण ऊर्जा को व्यक्ति अपने अंदर प्रचुर मात्रा में भर सकता है। तथा जिसके प्रभाव से उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन, चैतन्यता, स्फूर्ति, कार्य करने की क्षमता, सहन करने की शक्ति, मानसिक विचक्षणता आदि नाना प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती है। और उस विधि का नाम हैं - प्राणायाम।

PRANAYAM IN HINDI

प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ होता है -प्राण का आयाम। आयाम का मतलब वृद्धि करना। प्रत्येक योनि में हमें निश्चित श्वासों के खजाने के अनुसार आयुष्य प्राप्त होती है। यदि उन श्वासों को जल्दी जल्दी अविवेक पूर्ण ढंग से पूर्ण कर दिया जाये तो हम जल्दी ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं। और यदि उन्हीं श्वासों का अपव्यय न किया जाये, पूर्ण श्वास-प्रश्वास लिया और निकाला जाये तो उन सीमित श्वासों को लेने में हमें अधिक समय लगेगा अर्थात् हमारी आयु, जीवन अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो प्राणों की वृद्धि हो जायेगी।

इस लिए सही प्रकार से आवश्यकतानुसार श्वासोच्छवास प्रक्रिया को श्वासोयाम न कहकर प्राणायाम कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हमारी श्वास हमारे प्राणों अथवा चेतना को नियन्त्रित करती है। श्वास हमारे आन्तरिक भावों का नियन्त्रण करता है। भाव बदलते ही श्वास की गति बदल जाती है।

आवेग के समय श्वास की गति तेज हो जाती है, जबकि शांति का भाव आते ही, श्वास की गति मंद हो जाती है। प्राण अथवा चेतना मन को प्रभावित करते हैं। मन से बुद्धि, बुद्धि से ज्ञान और विवेक तथा ज्ञान और विवेक से आत्मा प्रभावित होती है ।

प्राणायाम द्वारा मन, बुद्धि, ज्ञान, विवेक विकसित कर आत्मा को परमात्मा बनाया जा सकता है। शरीर का भारीपन, मन और मस्तिष्क के तनाव से श्वसन क्रिया भी प्रभावित हो जाती है।

इस लिए प्राणायाम का उद्देश्य शरीर में प्राण ऊर्जा को उत्प्रेरित, संचालित, नियन्त्रित और संतुलित करना है। जिस प्रकार बाह्य शरीर की शुद्धि के लिए स्नान की जाती है, उसी प्रकार शरीर की आन्तरिक अवयवों की शुद्धि के लिए प्राणायाम का बहुत महत्त्व होता है। प्राणायाम योग की आत्मा है। जब तक श्वसन क्रिया चालू है, तभी तक हमारा जीवन है।

इस लिए श्वसन की प्रक्रिया को जानना, समझना और उसका ढंग से प्रयोग करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं।

अधूरी श्वास लेने वालों के फेंफड़े का अधिकांश भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। जिन मकानों की सफाई नहीं होती, उनमें गन्दगी, मकड़ी, मच्छर आदि का प्रकोप होने लगता है। ठीक इसी प्रकार फेंफड़े के जिस भाग में श्वसन द्वारा शरीर में जाने वाली वायु नहीं पहुंचती, उनमें क्षय, खांसी, जुकाम कफ, दमा आदि रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

इस लिए हमें ऐसी आदत डालनी चाहिये कि सदैव इस प्रकार श्वास ली जाए कि वायु से पूरे फेंफड़े भर जायें । यह कार्य तेजी अथवा झटके से न हों, अपितु सहज होना चाहिये। धीरे धीरे इस प्रकार श्वास लें, ताकि सीना भरपूर चौड़ा हो जाये। फिर उसी क्रम से धीरे धीरे वायु को बाहर निकाल देना चाहिये ।

छाती का कमजोर और कम चौड़ा होना स्वास्थ्य के लिये एक अभिशाप होता है, जिसकी तरफ प्रत्येक व्यक्ति की सजगता आवश्यक है।

योग शास्त्रों में प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया गया है। उसमें से चन्द विधियाँ जो हमारे प्रतिदिन के लिए उपयोगी है उनकी संक्षिप्त सैद्धान्तिक जानकारी ही यहां दी जा रही है।

जिज्ञासु व्यक्ति अनुभवी योग प्रशिक्षक के सानिध्य में प्राणायाम की विविध पद्धतियों का अवश्य विस्तृत अध्ययन एवं अभ्यास करें, क्योंकि प्राणायाम से सरल स्वास्थ्य सुरक्षा की दूसरी स्वावलम्बी विधि अधिक संभव नहीं होती तथा प्राणायाम के अभाव में सम्पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।


प्राणायाम की मुख्य चार अवस्थाएँ।


प्राणायाम में श्वास अन्दर खींचने की प्रक्रिया को पूरक कहेते है।

श्वास बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहेते है।

श्वास को अन्दर अथवा बाहर रोकने की अवस्था को कुम्भक कहते हैं।


प्राणायाम का मूल सिद्धान्त है श्वास धीरे धीरे परन्तु जितना गहरा लम्बा लिया जा सके लें। श्वास लेते समय पेट पूरा फूल जाना चाहिये । श्वास को जितना ज्यादा देर रोक सकें, अन्दर रोकने का प्रयास करें, ताकि श्वसन द्वारा शरीर में प्रविष्ट प्राण वायु अपना कार्य वापस बाहर निकलने के पूर्व पूर्ण कर सके अर्थात् आक्सीजन का पूरा उपयोग हो सके।

श्वास को धीरे धीरे निष्कासित करें। रेचक का समय पूरक से जितना ज्यादा होगा उतना प्राणायाम प्रभावकारी होता है । कुछ योगियों की ऐसी मान्यता है कि जितना ज्यादा श्वास को अंदर रोक कर रखा जाता है उतनी अधिक शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है। परन्तु यदि दिमाग को शांत करना हो तो श्वास को बाहर अधिक रोकने का अभ्यास करना चाहिए।


नाड़ी शुद्धि प्राणायाम केसे करे ? (अनुलोम विलोम प्राणायाम )

नाड़ी शुद्धि होने के बाद ही प्राणायाम श्रेष्ठ ढंग से किया जा सकता है। नाड़ी शुद्धि के लिये जो प्राणायाम किया जाता है, उसे अनुलोम विलोम प्राणायाम कहा जाता है। जन साधारण को अनुलोम विलोम प्राणायाम से ही प्राणायाम का प्रारम्भ करना चाहिये।

इसमें नासाग्र के किसी एक भाग से श्वास अन्दर लेकर दूसरे छिद्र से बाहर निकाला जाता है। फिर जिस छिद्र से श्वास बाहर निकाला जाता है, उस नासाग्र से पूरक करके दूसरे छिद्र से रेचक किया जाता है। यह एक चक्र होता है । ऐसे अनेकों आवर्तनों का अभ्यास किया जा सकता है।
श्वास जितना गहराऔर दीर्घ होता है, उतना प्राणायाम अच्छा होता है । जितना कुम्भक कर सकें उतना अभ्यास करें। पूरक से रेचक का समय जितना ज्यादा रख सकें उतना अच्छा और कुम्भक का समय भी कम से कम पूरक का दुगना होना चाहिये, तभी नाड़ी शुद्धि सही ढंग से होती है।

कपाल भाति प्राणायाम केसे करे ?

कपाल का मतलब खोपड़ी और भांति अर्थात प्रकाशित करना। इसमें शीघ्रता से पूरक और रेचक किया जाता है। कुम्भक नहीं। यह व्यायाम अत्यन्त परिश्रम पूर्वक करना चाहिये । इससे शरीर की सभी कोशिकाएँ, ज्ञान तन्तु और स्नायु जोर से कम्पित होते हैं।

कपाल भाति प्राणायाम के लाभ :

1.कपाल भाति प्राणायाम से खोपड़ी, श्वसन तंत्र और नासिका मार्ग स्वच्छ होता है।

2.दमा दूर होता है ।

3.बड़ी मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के निष्कासन से रक्त शुद्ध होता है।

4.हृदय की कार्य क्षमता सुधरती है।

5.श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और रक्त परिभ्रमण तंत्र बराबर कार्य करने लगते है।


सूर्य भेदी प्राणायाम केसे करे ?

इसमें दाहिने नथूने से श्वास ली जाती है और बांयें नथूने से श्वास निकाली जाती है।

सूर्य भेदी प्राणायाम के लाभ :

इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है, सक्रियता आती है। सर्दी सम्बन्धी रोगों और सर्दी की मौसम में यह प्राणायाम विशेष प्रभावकारी होता


चन्द्र भेदी प्राणायाम केसे करे ?

इसमें बांयें नथूने से पूरक और दाहिने नथूने से रेचक किया जाता है।

चन्द्र भेदी प्राणायाम के लाभ :

गर्मी और पित्त सम्बन्धी रोगों तथा गर्मी की मौसम में यह प्राणायाम बहुत लाभकारी होता है। इससे शरीर की थकान दूर होती है। निद्रा अच्छी आती है। शरीर में शीतलता बढ़ती है, बुखार में शीघ्र आराम मिलता है।


भ्रामरी प्राणायाम केसे करे ?

ध्यानावस्था में बैठ दोनों नेत्र बन्द कर दोनों हाथों की तर्जनी से दोनों कानों के छिद्र बन्द कर दें। होठों को आपस में मिला दें। फिर मन ही मन ओम् का गुंजार करें। दोनों नथूनों से पूरक और रेचक करने वाले ऐसे प्राणायाम को भ्रामरी प्राणायाम कहते हैं।


भ्रामरी प्राणायाम के लाभ :

इस प्राणायाम से मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध, निराशा में कमी आती है। स्वर में मधुरता बढ़ती है तथा श्वसन और गले के रोग में लाभ होता है, स्मरण शक्ति ठीक होती है।



प्राणायाम करने के 7 बड़े लाभ :

उपर बताए गए प्राणायाम जेसे की अनुलोम विलोम प्राणायाम , कपाल भाति प्राणायाम , सूर्य भेदी प्राणायाम , चन्द्र भेदी प्राणायाम ऑर भ्रामरी प्राणायाम  के लाभ । 

1. फेंफड़े मजबूत होते हैं।
2. रक्त के विकार दूर होते हैं।
3. शरीर का संतुलित और सुडोल विकास होता है।
4. मन में उत्साह एवं मानसिक बल भी बढ़ता है।
5. ध्यान में चित्त लगता है।
6. प्राणायाम से दीर्घ आयु प्राप्त होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है।
7. स्फूर्ति आती है, आलस्य नहीं आता।

प्राणायाम करने से पहेले की सावधानिया :

1. प्राणायाम करने से पहले हमारा शरीर अन्दर से और बाहर से शुद्ध होना चाहिए।
2. बैठते समय हमारी रीढ़ की हड्डियाँ  सीधी होनी चाहिए।
3.  सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन किसी भी आसन में बैठें, मगर जिसमें आप अधिक देर बैठ सकते हैं, उसी आसन में बैठें।
4. जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप है, उन्हें अपना रक्त-चाप साधारण होने के बाद धीमी गति से प्राणायाम करना चाहिये।
5. यदि आँप्रेशन हुआ हो तो, 6 महीने बाद ही प्राणायाम का धीरे धीरे अभ्यास करें।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।




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