Navel science - नाभि विज्ञान

नाभि चिकित्सा 


नाभि विज्ञान


मनुष्य जीवन मे विकास, संचालन एवं नियंत्रण में नाभि की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।महिला के पेट में गर्भाधान से लेकर जिंदगी के अंतिम क्षणों तक नाभि केन्द्र सजग, सतर्क एवं क्रियाशील रहता है।

मा के गर्भ में नवजात बालक का सबसे पहले नाभि केन्द्र ही विकसित होता है। नाभि में हमारी पैतृक ऊर्जा का संचय होता है। जो बीज से वृक्ष की भांति हमारे सम्पूर्ण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

गर्भस्थ नवजात बालक में नाभि के माध्यम से ही गर्भावस्था में विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों की पूर्ति होती है।

मा गर्भ से बाहर आते ही सबसे पहेले माता के शरीर को नाभि से जोड़ने वाली नली का सम्बन्ध विभाजन करना अति महत्वपूर्ण होता है। जिससे नवजात शिशु स्वतन्त्र रूप से श्वास लेकर अपनी जीवन यात्रा की शुरुआत कर सकें।

अगर अनजाने मे जन्म लेते ही नाभि को माता से जोड़ने वाली नली को जल्दी से न काटा जायें और नली को काटते ही बच्चा न रोंये तो बालक विकलांग हो सकता है।


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नाभि का मानव जीवन मे महत्व

नाभि में हमारे प्राणों का संग्रह होता है। यह शरीर का डायनेमो अथवा बैटरी है। ब्रह्माण्ड में जो भी घटित होता है, वह हमारे शरीर के अणु-अणु को प्रभावित करता है। हमारी कोशिकाएँ शरीर में ब्रह्माण्ड का लघुतम रूप हैं।

नाभि ही ब्रह्माण्ड से ऊर्जा को अपने आवश्यकतानुसार ग्रहण करने, संग्रह करने तथा रूपान्तरित करने की क्षमता रखती है। नाभि शरीर की धुरी है तथा शरीर में कार्यरत विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं का केन्द्र है।

नाभि उठते-बैठते, दौड़ते-चलते, सोते अथवा किसी भी स्थिति के अंगों-उपांगों को अपने स्थान पर स्थिर रखती है। हमारी अधिकांश शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्रियाओं के संचालन में इसकी प्रभावशाली भूमिका होती है।

कुण्डलिनी जागृत कर अन्य चक्रों को सजग करना हों अथवा प्राणायाम की साधना या पातंजलि योग द्वारा यम से समाधि तक की अवस्था को प्राप्त करना आदि, सारी क्रियाएँ नाभि की स्वस्थता पर ही निर्भर करती है।

योगी पुरुष अपनी नाभि को संतुलित रख मन को नियंत्रित करते हैं। मन के माध्यम से संकल्प शक्ति को ऊपर उठाते हुए मस्तिष्क केन्द्र को स्थिर करते हैं। यही निर्विकल्प अवस्था होती है और सारी साधना का परम लक्ष्य भी इसी अवस्था को प्राप्त करना होता है।

जिस प्रकार वृत का केन्द्र होते हुए भी चित्र में वह नहीं दिखता, ठीक उसी प्रकार मन व आत्मा की भांति नाभि भी एक्सरे अथवा सोनोग्राफी की पकड़ में नहीं आती। इस लिए आज का ऐलोपैथिक विज्ञान इसके अस्तित्व को स्वीकार करने में परेशानी अनुभव कर रहा है।

नाभि केन्द्र खिसकने के लक्षण

नाभि विज्ञान


  • नाभि अपने स्थान से अन्दर की तरफ हो जाए, उस व्यक्ति का वजन दिन प्रतिदिन घटता चला जाता है।

  • यदि किसी कारण नाभि अपने स्थान से बाहर की तरफ हो जाती है तो शरीर का वजन न चाहते हुए भी अनावश्यक बढ़ने लगता है।

  • किसी कारण नाभि यदि अपने स्थान से ऊपर की तरफ चढ़ जाती है तो खट्टी डकारें, अपच आदि की शिकायतें रहने लगती है। कब्जी हो सकती है।

  • परन्तु यदि नाभि अपने स्थान से नीचे की तरफ चली जाती है तो दस्तों की शिकायत हो जाती है।

  •  इसी प्रकार नाभि कभी दायें, बांये अथवा तिरछी दिशाओं में भी हट जाती है, जिससे शरीर में अनेक प्रकार के रोग होने लगते है।

सारे परीक्षण एवं पेथोलोजिकल टेस्ट करने के पश्चात् भी रोग पकड़ में नहीं आता। ऐसे में नाभि केन्द्र को अपने केन्द्र में लाने से तुरन्त राहत मिलने लग जाती है।


नाभि केन्द्र खिसकने कारण

गलत ढंग से श्वसन क्रिया करने, योगासन न करने अथवा गलत ढंग से करने अथवा शरीर का संतलन बिगाड़ने वाली अन्य प्रवृत्तियों के कारण भी नाभि अपने केन्द्र से हट जाती है। स्कूटर में कीक मारने अथवा गलत तरीके से वजन उठाने पर नाभि प्राय: ऊपर की तरफ, झुककर अधिक देर बैठने से अन्दर की तरफ जा सकती है।

गलत खान-पान एवं जीवनचर्या के साथ प्रतिदिन की चिन्तायें, दुःख, तनाव, आवेग, क्रोध, द्वेष, घृणा आदि प्रवृतियाँ विभिन्न मानसिक जहरों के माध्यम से शरीर पर अपना प्रभाव निरन्तर छोड़ती रहती है।

इससे नाभि क्षेत्र में विजातीय तत्त्वों का जमाव होने लगता है। यदि इन दुष्प्रवृत्तियों के दुष्प्रभावों का प्रायश्चित एवं सम्यक् चिन्तन किया जावे तथा समभाव पूर्ण जीवन जीया जावे तो भविष्य में इन दोषों के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।


नाभि निरक्षण की विधि

नाभि अपने स्थान पर है अथवा नहीं, पता लगाने की अनेकों विधियाँ होती है परन्तु यहाँ एक ही प्रमुख विधि का तरिका बताया जा रहा है।

जिस व्यक्ति की नाभि चेक करती हो उस व्यक्ति को जमीन पर पीठ के बल सुला दीजिये। फिर अपने बांयें अथवा दाहिने हथेली की पांचों अंगुलियों को एक साथ मिलाकर ठीक नाभि पर दबाव देते हुये रखिये।

यदि नाभि अपने स्थान पर होगी तो पांचों अंगुलियों के बीच में आपको स्पन्दन का आभास होगा। यदि नाभि थोड़ी हटी हुई हो तो नाभि का स्पन्दन पांचों अंगुलियों में किसी अंगुली के नीचे प्राय: अनुभव होगा परन्तु यदि नाभि अपने केन्द्र से अधिक हटी हुई हो तो नाभि क्षेत्र के आसपास पांचों अंगुलियों से दबाव देते हुए, उस स्थान को मालूम करें, जहाँ स्पन्दन आ रहा हो।

जहां पर स्पन्दन आता है, नाभि चक्र उसी स्थान पर होता है। परन्तु जिन लोगों का पेट मोटा अथवा कठोर होता है, उन लोगों के नाभि चक्र का स्पन्दन आसानी से पता नहीं चलता तथा ढूंढने वाले के नाभि क्षेत्र में पर्याप्त दबाव डालकर ढूंढना पड़ता है।


नाभि केन्द्र सही करने की विधियाँ

नाभि केन्द्र को अपने स्थान पर लाने के लिये भारत में अनेकों विधियाँ प्रचलित है। वे इतनी सरल है कि कोई भी जिज्ञासु, शिक्षित, अशिक्षित, बच्चा, बुढ़ा, आसानी से उन विधियों को सीख सकता है। नाभि के केन्द्र में स्पन्दन का अनुभव होने पर वह अपने स्थान पर कहीं जाती है। परन्तु यदि स्पन्दन केन्द्र में न हों तो, बोलचाल की भाषा में हम धरण का टलना, पेचुटि अथवा नाभि का खिसकना कहते हैं।


नाभि विज्ञान

प्रातःकाल खाली पेट रोगी को सीधा सुलाएँ। नाभि के आसपास बाल हों तो उन्हें साफ कर लें, अथवा पानी से गिला कर लें। उसके पश्चात् रोगी को पांच सात बार गहरा एवं लम्बा श्वास लेने को कहें।

उसके पश्चात् नाभि के केन्द्र पर जलता हुआ दीपक रख उसको कांच की गिलास से ढक दें तथा पेट पर ग्लास को हल्का सा दबाव देकर रखें। थोड़ी देर बाद गिलास के अन्दर ऑक्सीजन समाप्त हो जाने से दीपक बुझ जायेगा तथा गिलास पेट पर चिपक जायेगी तथा उसके अन्दर की वायु नाभि के स्पन्दन को अपनी जगह पर लाने के लिये खिंचाव करेगी।

जब नाभि का स्पन्दन अपने केन्द्र में आ जायेगा तो गिलास अपने आप पेट से हट जायेगी।

जितनी देर से गिलास हटती है, उतने ही अनुपात में नाभि क्षेत्र में प्राण ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध होता है। रोग ज्यादा अथवा कम, पुराना अथवा तत्कालीन होता है।

अगर नाभि का स्पन्दन अपने केन्द्र में होता है तो गिलास दीपक बुझने के पश्चात् या तो पेट से चिपकेगी भी नहीं अथवा तुरन्त हट जायेगी। गिलास हटने के पश्चात् पुन: नाभि का स्पन्दन उसके केन्द्र में जांच कर लें। गिलास हटने के पश्चात् उसी स्थान पर रोगी को बैठा कर कुछ सात्विक ठोस पोष्टिक भोजन कराना चाहिये, ताकि पेट में भोजन के दबाव से नाभि का स्पन्दन अपने स्थान पर ही केन्द्रित रहे।

आजकल दीपक के स्थान पर पंप, आर्गन डेवलेपर अथवा ब्रेस्ट पम्प का उपयोग भी किया जाता है। विशेषकर उन रोगियों के लिये जिनके तोंद ज्यादा हों अथवा नाभि का स्पन्दन बहुत गहरा अथवा केन्द्र से बहुत दूर हो । पम्प द्वारा खिंचाव उतना ही देना चाहिये जितना रोगी सहन कर सकें।



सुबह खाली पेट कमर सीधी करके सीधे लेट जायें। सर्व प्रथम 25-30 बार सीधी एवं उल्टी साइकलिंग का व्यायाम करें। फिर रीढ़ के घुमावदार राजा और रानी आसन 25-30 बार करें। दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर उठायें तथा 90 डिग्री के कोण पर रखें। फिर सिर को बिना जमीन से उठाएँ दोनों पैरों को सीधे रखते हुए धीरे-धीरे जमीन पर लाएं। ऐसा उत्तानपादासन 5-6 बार करें।

उसके पश्चात् 5-6 बार नौकासन विधि पूर्वक करें। ऐसा करने से खिसकी हुई धरण अपने स्थान पर आ जाती है।

सुबह भूखे पीठ के बल सीधे लेट जायें। दोनों टखनों तथा घुटनों को साथ-साथ रखें। यदि धरण अपने स्थान पर नहीं होती है तो एक पैर का अंगूठा दूसरे पैर के अंगूठे से कुछ बड़ा लगेगा। अर्थात् दोनों अंगूठे बराबर नहीं होंगे। जो अंगूठा नीचे हों उसे हाथ से ऊपर की ओर खीचें। दो-तीन बार खींचने से दोनों अंगूठे बराबर हो जायेंगे और धरण अपने स्थान पर आ जायेगी।

यदि छोटे पैर को खिंचना किसी कारण संभव न हों तो पैरों को संतुलन करने की विधि से दोनों पैरों को बराबर करने से नाभि अपने केन्द्र में आ जाती है।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।


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