( pdf ) swar vigyan in hindi - स्वर विज्ञान इन हिन्दी

Swar Vigyan in Hindi - स्वर विज्ञान इन हिंदी


swar vigyan in hindi - स्वर विज्ञान इन हिन्दी

स्वर विज्ञान जानना क्यो जरूरी है ? Why is it important to know swar vigyan ?

सृष्टि की रचना में सूर्य और चन्द्र का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। हमारा जीवन अन्य ग्रहों की अपेक्षा सूर्य और चन्द्र से अधिक प्रभावित होता है। उसी के कारण दिन-रात होते हैं तथा जलवायु बदलती रहती है। समुद्र में ज्वार भी सूर्य एवं चन्द्र के कारण आता हैं।

हमारे शरीर में भी लगभग दो तिहाई भाग पानी होता है। सूर्य और चन्द्र के गुणों में बहुत विपरीतता होती है। एक गर्मी का तो दूसरा ठण्डक का स्रोत माना जाता है। सर्दी और गर्मी सभी चेतनाशील प्राणियों को बहुत प्रभावित करते हैं। शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारेहनाइट निश्चित होता है और उसमें बदलाव होते ही रोग होने की संभावना होने लगती है।

मनुष्य के शरीर में भी सूर्य और चन्द्र की स्थिति शरीरस्थ नाड़ियों में मानी गई है। मूलधारा चक्र से सहस्रार चक्र तक शरीर में 72000 नाड़ियों का हमारे पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है। स्वर विज्ञान :- सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों को शरीर में स्थित इन सूक्ष्म नाड़ियों की सहायता से अनुकूल बनाने का विज्ञान है।

ऊपर की बात समजने के बाद हमे यह जानना बहुत जरूरी है की स्वर विज्ञान क्या है ?


स्वर क्या है?

नासिका द्वारा श्वास के अंदर जाने और बाहर निकलते समय जो अव्यक्त ध्वनि होती है, उसी को स्वर कहते हैं।


नाड़ियाँ क्या है?

swar vigyan in hindi - स्वर विज्ञान इन हिन्दी

नाड़ियाँ चेतनाशील प्राणियों के शरीर में वे मार्ग हैं जिनमें से होकर प्राण ऊर्जा शरीर के विभिन्न भागों तक प्रवाहित होती है। हमारे शरीर में तीन मुख्य नाड़ियाँ होती है। ये तीनों नाड़ियाँ मूलधारा चक्र से सहस्रार चक्र तक मुख्य रूप से चलती है।

इनके नाम ईडा, पिंगला और सुषुम्ना हैं। इन नाड़ियों का सम्बन्ध स्थूल शरीर से नहीं होता। इस लिए आधुनिक यंत्रों, एक्स-रे, सोनोग्राफी आदि यंत्रों से अभी तक उनको प्रत्यक्ष देखना संभव नहीं हो सका है। जिन स्थानों पर ईडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ आपस में मिलती है उनके संगम स्थल को शरीर में ऊर्जा चक्र अथवा शक्ति केन्द्र कहते हैं।

ईडा और पिंगला नाड़ी तथा दोनों नथूनों से प्रवाहित होने वाली श्वास के बीच सीधा संबन्ध होता है। सुषुम्ना के बांयीं तरफ ईडा और दाहिनी तरफ पिंगला नाड़ी होती है । ये दोनों नाड़ियाँ मूलधारा चक्र से बायें-दाहिने होकर अपना क्रम परिवर्तित करती हुई सीधे ऊपर की तरफ चित्र में दर्शाए अनुसार बढ़ती है।

प्रत्येक चक्र पर एक दूसरे को काटती हुई आगे नाक के नथूनों तक पहुंचती हैं। उनके इस परस्पर सम्बन्ध के कारण ही व्यक्ति नासिका के श्वांस प्रवाहों को प्रभावित करके अत्यन्त सूक्ष्म स्तर पर ईडा और पिंगला नाड़ी में संतुलन स्थापित कर सकता है।



स्वर विज्ञान में दोनों नथुनों की भूमिका - swar vigyan Role of both nostrils in respiration

जन्म से मृत्यु तक हमारे श्वसन की क्रिया निरन्तर चलती रहती है। यह क्रिया दोनों नथूनों से एक ही समय समान रूप से अधिक नहीं होती । श्वास कभी बांये नथुने से, तो कभी दाहिने नथुने से चलता है। कभी-कभी थोड़े समय के लिए दोनों नथुने से समान रूप से चलता है।

बांये नथूने में जब श्वास की प्रक्रिया होती है तो उसे ईडा नाड़ी में चलना, दाहिने नथूने में जब श्वास की प्रक्रिया मुख्य होती है तो उसे पिंगला नाड़ी मे चलना तथा जब श्वास दोनों नथूने में समान रूप से चलता है तो उस अवस्था को सुषुम्ना नाड़ी में चलना कहते हैं।

एक नथूने को दबाकर दूसरे नथूने के द्वारा श्वास बाहर निकालने पर यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है कि एक नथूने से जितना सरलतापूर्वक श्वास चलता है उतना, उसी समय अधिक दूसरे नथूने से नहीं चलता।

जुकाम आदि न होने पर भी मानों दूसरा नथूना अधिक बंद है, ऐसा अनुभव होता है। जिस समय जिस नथूने से श्वास सरलतापूर्वक चलता है, उस समय उसी नथूने से सम्बन्धित नाड़ी में श्वास का चलना कहा जाता है तथा उस समय अव्यक्त स्वर को उसी नाड़ी के नाम से पहिचाना जाता है।

इसलिए स्वर विज्ञान मे ईडा नाड़ी के चलने पर ईडा स्वर, पिंगला नाड़ी के चलने पर पिंगला स्वर और सुषुम्ना से श्वसन होने पर सुषुम्ना स्वर प्रभावी होता है।

ईडा और पिंगला श्वास प्रवाहों का सम्बन्ध अनुकंपी (सिम्पेथेटिक) और परानुकम्पी (पेरासिम्पेथेटिक) स्नायु संस्थान से होता है। जो शरीर के विभिन्न क्रिया कलापों का नियंत्रण और संचालन करते हुए उन्हें परस्पर संतुलित बनाए रखती है। ईडा और पिंगला दोनों स्वरों का कार्य क्षेत्र कुछ समानताओं के बावजूद अलग-अलग होता है।

ईडा का संबंध ज्ञानवाही धाराओं, मानसिक क्रिया कलापों से होता है। पिंगला का संबंध क्रियाओं से अधिक होता है। अर्थात् इडा शक्ति का आन्तरिक रूप होती है जबकि पिंगला शक्ति का बाह्य रूप तथा सुषुम्ना केन्द्रीय शक्ति होती है, तथा उसका संबंध केन्द्रीय नाड़ी संस्थान (Central Nervous system) से होता है। जब पिंगला स्वर प्रभावी होता है, उस समय शरीर की बाह्य क्रियाएँ सुगमता से होने लगती है। शारीरिक ऊर्जा दिन के समान सजग, सक्रिय और जागृत होने लगती है। अत: पिंगला नाड़ी को सूर्य नाड़ी एवं उसके स्वर को सूर्य स्वर भी कहते हैं।

परन्तु जब ईडा स्वर सक्रिय होता है तो, उस समय शारीरिक शक्तियाँ सुषुप्त अवस्था में विश्राम कर रही होती है। इसलिए आन्तरिक कार्यों हेतु अधिक ऊर्जा उपलब्ध होने से मानसिक सजगता बढ़ जाती है।

चन्द्रमा से मन और मस्तिष्क अधिक प्रभावित होता है। क्योंकि चन्द्रमा को मन का मालिक भी कहते हैं। इसलिए ईडा नाड़ी को चन्द्र नाड़ी और उसके स्वर को चन्द्र स्वर भी कहते हैं। चन्द्र नाड़ी शीतल प्रधान होती है, जबकि सूर्य नाड़ी उष्ण प्रधान । सुषुम्ना दोनों के बीच संतुलन रखती

सूर्य स्वर - मस्तिष्क के बायें भाग एवं शरीर में मस्तिष्क के नीचे के दाहिने भाग को नियंत्रित करता है। जबकि चन्द्र स्वर मस्तिष्क के दाहिने भाग एवं मस्तिष्क के नीचे शरीर के बायें भाग से संबंधित अंगों, उपांगों में अधिक प्रभावकारी होता है । जो स्वर ज्यादा चलता है, शरीर में उससे संबंधित भाग को अधिक ऊर्जा मिलती है तथा बाकी बचे दूसरे भागों को अपेक्षित ऊर्जा नहीं मिलती। इसलिए जो अंग कमजोर होता है, उससे संबंधित स्वर को चलाने से रोग में शीघ्र लाभ होता है।

स्वस्थ मनुष्य का स्वर प्रकृति के निश्चित नियमों के अनुसार चला करता है । उनका अनियमित प्रकृति के विरुद्ध चलना शारीरिक और मानसिक रोगों के आगमन और भावी अमंगल का सचक होता है। ऐसी स्थिति में स्वरों को निश्चित और व्यवस्थित ढंग से चलाने के अभ्यास से अनिष्ट और रोगों से न केवल रोकथाम होती होती है, अपितु उनका उपचार भी किया जा सकता है।

शरीर में कुछ भी गड़बड़ होते ही गलत स्वर चलने लग जाता है। नियमित रूप से सही स्वर अपने निर्धारित समयानुसार तब तक नहीं चलने लगता, जब तक शरीर पूर्ण रूप से रोग मुक्त नहीं हो जाता।


स्वर विज्ञान मे स्वर का नियंत्रण ही स्वास्थ्य का मूलाधार - swar vigyan in swar Control of health is the foundation of health


स्वर विज्ञान भारत के ऋषि मुनियों की अद्भुत खोज है। उन्होंने मानव शरीर की प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया का सूक्ष्मता से अध्ययन किया, देखा, परखा तथा श्वास-निःश्वास की गति, शक्ति, सामर्थ्य के सम्बन्ध में आश्चर्य चकित कर देने वाली जो जानकारी हमें दी उसके अनुसार मात्र स्वरों को आवश्यकतानुसार संचालित, नियन्त्रित करके जीवन की सभी समस्याओं का समाधान पाया जा सकता है। जिसका विस्तृत विवेचन “शिव स्वरोदय शास्त्र में किया गया है। जिसमें युग पुरुष-शिवजी ने स्वयं पार्वती को स्वर के प्रभावों से परिचित कराया।


प्रकृति ने हमें अपने आपको स्वस्थ और सुखी रहने के लिए सभी साधन और सुविधाएँ उपलब्ध करा रखी है। परन्तु हम अधिक प्रकृति की भाषा और संकेतों को समझने का प्रयास नहीं करते।

  • हमारे नाक में दो नथूने क्यों?
  • यदि इनका कार्य मात्र श्वसन ही होता तो एक छिद्र से भी कार्य चल सकता है।
  • दोनों में हमेशा एक साथ बराबर श्वास निःश्वास की प्रक्रिया क्यों नहीं होती?
  • कभी एक नथूने में श्वास का प्रवाह सक्रिय होता है तो, कभी दूसरे में क्यों?
  • क्या हमारी गतिविधियों और श्वास का आपस में तालमेल होता है?
  • हमारी क्षमता का पूरा उपयोग क्यों नहीं होता?
  • कभी-कभी कार्य करने में मन लग जाता है तो, कभी बहुत प्रयास करने के बावजूद हमारा मन क्यों नहीं लगता?

ऐसी समस्त समस्याओं का समाधान स्वर विज्ञान में मिलता है। शरीर की बनावट में प्रत्येक भाग का कुछ न कुछ महत्व अवश्य होता है। कोई भी भाग अनुपयोगी अथवा पूर्णतया व्यर्थ नहीं होता।


स्वार विज्ञान हमारे शरीर को कैसे प्रभावित करता है? How does swar vigyan affect our body?


स्वरों और मुख्य नाड़ियों का आपस में एक दूसरे से सीधा सम्बन्ध होता है। ये व्यक्ति के सकारात्मक और नकारात्मक भावों का प्रतिनिधित्व करती है जो। उसके भौतिक अस्तित्व से सम्बन्धित होते हैं। उनके सम्यक् संतुलन से ही शरीर के ऊर्जा चक्र जागृत और सजग रहते हैं। अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ क्रियाशील होती है।

चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी में प्राण वायु का प्रवाह नियमित रूप से बदलता रहता है। सामान्य परिस्थितियों में यह परिवर्तनअधिक प्रति घंटे के लगभग अन्तराल में होता है। परन्तु ऐसा ही होना अनिवार्य नहीं होता। यह परिवर्तन हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। जब हम अन्तर्मुखी होते हैं उस समय अधिक चन्द्र स्वर तथा जब हम बाहा प्रवृत्तियों में सक्रिय होते हैं तो सूर्य स्वर अधिक प्रभावी होता है।

यदि चन्द्र स्वर की सक्रियता के समय हम शारीरिक श्रम के कार्य करें तो उस कार्य में अधिक मन नहीं लगता। उस समय मन अन्य कुछ सोचने लग जाता है। ऐसी स्थिति में यदि मानसिक कार्य करें तो, बिना किसी कठिनाई के वे कार्य सरलता से हो जाते है। ठीक उसी प्रकार जब सूर्य स्वर चल रहा हों और उस समय यदि हम मानसिक कार्य करते हैं तो उस कार्य में मन नहीं लगता। एकाग्रता नहीं आती। इसके बावजूद भी जबरदस्ती कार्य करते हैं तो, सिर दर्द होने लगता है।

कभी-कभी सही स्वर चलने के कारण मानसिक कार्य बिना किसी प्रयास के होते चले जाते हैं तो, कभी-कभी शारीरिक कार्य भी पूर्ण रुचि और उत्साह के साथ होते हैं।

यदि सही स्वर में सही कार्य किया जाए तो हमें प्रत्येक कार्य में अपेक्षित सफलता सरलता से प्राप्त हो सकती है। जैसे अधिकांश शारीरिक श्रम वाले साहसिक कार्य जिसमें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, सूर्य स्वर में ही करना अधिक लाभदायक होता है। सूर्य स्वर में व्यक्ति की शारीरिक कार्य क्षमता बढ़ती है। ठीक उसी प्रकार जब चन्द्र स्वर चलता है, उस समय व्यक्ति में चिन्तन, मनन और विचार करने की क्षमता बढ़ती है।


स्वर विज्ञान के माध्यम से शरीर के तापमान को कैसे संतुलित करें? How to balance body temperature through swar vigyan ?

जब चन्द्र स्वर चलता है तो शरीर में गर्मी का प्रभाव घटने लगता है।

  • इस लिए  गर्मी सम्बन्धित रोगों ओर  बुखार के समय चन्द्र स्वर को चलाया जाये तो बुखार शीघ्र ठीक हो सकता है।
  • ठीक इसी प्रकार भूख के समय जठराग्नि, आरोग्य आपका भोग के समय कामाग्नि और क्रोध, उत्तेजना के समय अधिक मानसिक गर्मी होती है।
  • इस लिए  ऐसे समय चन्द्र स्वर को सक्रिय रखा जावे तो उन पर सहजता से नियंत्रण पाया जा सकता है।

शरीर में होने वाले जैविक रासायनिक परिवर्तन जो कभी शांत और स्थिर होते हैं तो कभी तीव्र और उग्र भी होते हैं। जब शरीर में तापीय असंतुलन होता है तो शरीर में रोग होने लगते हैं। इस लिए  यह प्रत्येक व्यक्ति के स्वविवेक पर निर्भर करता है कि उसके शरीर में कितना तापीय असंतुलन है और उसके अनुरूप अपने स्वरों का संचालन कर अपने आपको स्वस्थ रखें। जब दोनों स्वर बराबर चलते हैं शरीर की आवश्यकता के अनुरूप चलते हैं तब ही व्यक्ति स्वस्थ रहता है।

दिन में सूर्य के प्रकाश और गर्मी के कारण सामान्यतः शरीर में भी गर्मी अधिक रहती हैं। इस लिए  सूर्य स्वर से सम्बन्धित कार्य करने के अलावा जितना ज्यादा चन्द्र स्वर सक्रिय होगा उतना स्वास्थ्य अच्छा होता है।

इसी प्रकार रात्रि में दिन की अपेक्षा ठण्डक ज्यादा रहती है। चांदनी रात्रि में इसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। श्रम की कमी अथवा निद्रा के कारण भी शरीर में निष्क्रियता रहती है। इस लिए  उसको संतुलित रखने के लिए सूर्य स्वर को अधिक चलाना चाहिए। इसी कारण जिन व्यक्तियों के दिन में चन्द्र स्वर और रात में सूर्य स्वर स्वभाविक रूप से अधिक चलता है वे मानव दीर्घायु होते हैं।

चन्द्र और सूर्य नाड़ी का असंतुलन ही थकावट, चिंता तथा अन्य रोगों को जन्म देता है। इस लिए  दोनों का संतुलन और सामन्जस्य स्वस्थता हेतु अनिवार्य हैं। चन्द्र नाड़ी का मार्ग निवृत्ति का मार्ग है, परन्तु उस पर चलने से पूर्व सही सकारात्मक सोच आवश्यक है। इसी कारण पातंजली योग और कर्म निर्जरा के भेदों में ध्यान से पूर्व स्वाध्याय की साधना पर जोर दिया गया है। स्वाध्याय के अभाव में नकारात्मक निवृत्ति का मार्ग हानिकारक और भटकाने वाला हो सकता है। आध्यात्मिक साधकों को चन्द्र नाड़ी की क्रियाशीलता का विशेष ध्यान रखना चाहिये।

लम्बे समय तक रात्रि में लगातार चन्द्र स्वर चलना और दिन में सूर्य स्वर चलना, रोगी की अशुभ स्थिति का सूचक होता है और उसकी आयुष्य चन्द मास ही शेष रहती है।

सूर्य नाड़ी का कार्य प्रवृत्ति का मार्ग है। यह वह मार्ग हैं जहां अन्तर्जगत गौण होता है। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत लाभ तथा महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु कठिन परिश्रम करता है। कामनाओं और वासनाओं की पूर्ति हेतु प्रयलशील होता है। इसमें चेतना अत्यधिक बहिर्मुखी होती है। इस लिए ऐसे व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर सफलता पूर्वक आगे नहीं बढ़ पाते।

चन्द्र और सूर्य नाड़ी के क्रमशः प्रवाहित होते रहने के कारण ही व्यक्ति उच्च सजगता में प्रवेश नहीं कर पाता। जब तक ये क्रियाशील रहती है, योगाभ्यास में अधिक प्रगति नहीं हो सकती। जिस क्षण ये दोनों शांत होकर सुषुम्ना के केन्द्र बिंदु पर आ जाती है, तभी सुषुम्ना की शक्ति जागृत होती है और वहीं से अंतर्मुखी ध्यान का प्रारम्भ होता


स्वर विज्ञान मे सुषुम्ना क्या हे ? what is Sushumna in swar vigyan 


चन्द्र और सूर्य नाड़ी में जब श्वास का प्रवाह शांत हो जाता है तो सुषुम्ना में प्रवाहित होने लगता है। इस अवस्था में व्यक्ति की सुप्त शक्तियां सुव्यवस्थित रूप से जागृत होने लगती है। इस लिए वह समय अन्तर्मुखी साधना हेतु सर्वाधिक उपयुक्त होता है।
व्यक्ति में अहम समाप्त होने लगता है। अहम और आत्मज्ञान उसी प्रकार एक साथ नहीं रहते, जैसे दिन के प्रकाश में अंधेरे का अस्तित्व नहीं रहता। अपने अहंकार को न्यूनतम करने का सबसे उत्तम उपाय सूर्य नाड़ी और चन्द्र नाड़ी के प्रवाह को संतुलित करना है। जिससे हमारे शरीर, मन और भावनायें कार्य के नये एवं परिष्कृत स्तरों में व्यवस्थित होने लगती है।
चन्द्र और सूर्य नाड़ी का असंतुलन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करता है।
  1. जीवन में सक्रियता व निष्क्रियता में,
  2. इच्छा व अनिच्छा में,
  3. सुसुप्ति और जागृति में,
  4. पसंद और नापसंद में,
  5. प्रयत्न  और प्रयत्नहीनता में,
  6. पुरुषार्थ और पुरुषार्थ हीनता में,
  7. विजय और पराजय में,
  8. चिन्तन और निश्चित्तता में ,
  9. तथा स्वछन्दता और अनुशासन में दृष्टिगोचर होता है।

स्वर विज्ञान के अनुसार ध्यान के लिए सबसे अच्छा समय क्या है?-  What is the best time for meditation according to swar vigyan  ?

जब चन्द्र नाड़ी से सूर्य नाड़ी में प्रवाह बदलता है तो इस परिवर्तन के समय एक साम्य अथवा संतुलन की अवस्था आती है। उस समय प्राण ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होती है अर्थात् यों कहना चाहिये कि सुषुम्ना स्वर चलने लगता है। यह साम्य अवस्था मात्र थोड़ी देर के लिए ही होती है। यह समय ध्यान के लिए सर्वोत्तम होता है।

ध्यान की सफलता के लिए प्राण ऊर्जा का सुषुम्ना में प्रवाह आवश्यक है। इस परिस्थिति में व्यक्ति न तो शारीरिक रूप से अत्यधिक क्रियाशील होता है और न ही मानसिक रूप से विचारों से अति विक्षिप्त । प्राणायाम एवं अन्य विधियों द्वारा इस अवस्था को अपनी इच्छानुसार प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि योग साधना में प्राणायाम को इतना महत्व दिया जाता है।

प्राणायाम ध्यान हेतु ठोस आधार बनाता है। कपाल भाति प्राणायाम करने से सुषुम्ना स्वर शीघ्र चलने लगता है।


स्वर विज्ञान के अनुसार स्वर कैसे जानें ? - How to know swar according to swar vigyan ?


नथूने के पास अपनी अंगुलियां रख श्वसन क्रिया का अनुभव करें। जिस समय जिस नथूने से श्वास प्रवाह होता है, उस समय उस स्वर की प्रमुखता होती है। बायें नथूने से श्वास चलने पर चन्द्र स्वर, दाहिने नथूने से श्वास चलने पर सूर्य स्वर तथा दोनों नथूने से श्वास चलने की स्थिति को सुषुम्ना स्वर का चलना कहते हैं।
स्वर को पहचानने का दूसरा तरीका है कि हम बारी-बारी से एक नथूना बंद कर दूसरे नथूने से श्वास लें और छोड़ें। जिस नथूने से श्वसन सरलता से होता है, उस समय उससे सम्बन्धित स्वर प्रभावी होता है।

स्वर विज्ञान के अनुसार स्वर बदलने के नियम : Rules for changing swar according to swar vigyan :


अस्वभाविक अथवा प्रवृत्ति की आवश्यकता के विपरीत स्वर शरीर में अस्वस्थता का सूचक होता है। निम्न विधियों द्वारा स्वर को सरलतापूर्वक कृत्रिम ढंग से बदला जा सकता है, ताकि हमें जैसा कार्य करना हो उसके अनुरूप स्वर का संचालन कर प्रत्येक कार्य को सम्यक् प्रकार से पूर्ण क्षमता के साथ कर सकें।

  1. जो स्वर चलता हो, उस नथून को अंगुलि से या अन्य किसी विधि द्वारा थोड़ी देर तक दबाये रखने से, विपरीत इच्छित स्वर चलने लगता है।

  2.  चालू स्वर वाले नथूने से पूरा श्वास ग्रहण कर, बंद नथूने से श्वास छोड़ने की क्रिया बार-बार करने से बंद स्वर चलने लगता है।

  3. जो स्वर चालू करना हो, शरीर में उसके विपरीत भाग की तरफ करवट लेकर सोने तथा सिर को जमीन से थोड़ा ऊपर रखने से इच्छित स्वर चलने लगता है।

  4. जिस तरफ का स्वर बंद करना हो उस तरफे की बगल में दबाव देने से चालू स्वर बंद हो जाता है तथा इसके विपरीत दूसरा स्वर चलने लगता है।

  5. जो स्वर बंद करना हो, उसी तरफ के पैरों पर दबाव देकर, थोड़ा झुक कर उसी तरफ खड़ा रहने से, उस तरफ का स्वर बंद हो जाता है।
  6. जो स्वर बंद करना हो, उधर गर्दन को घुमाकर ठोडी पर रखने से कुछ मिनटों में वह स्वर बंद हो जाता है।
  7. घी अथवा शहद जो भी बराबर पाचन हो सके पीने से चालू स्वर तुरंत बंद हो जाता है। परन्तु साधारण अवस्था में दूध या अन्य तरल पदार्थ पीने से भी स्वर बदली हो जाता है।

  8. लित स्वर में स्वच्छ रुई डालकर नथूने में अवरोध उत्पन्न करने से स्वर बदल जाता है।
  9. कपाल-भाति और नाड़ी शोधन प्राणायाम से सुषुम्ना स्वर चलने लगता है।

निरंतर चलते हुए सूर्य या चन्द्र स्वर के बदलने के सारे उपाय करने पर भी यदि स्वर न बदले तो रोग असाध्य होता है तथा उस व्यक्ति की मृत्यु समीप होती है। मृत्यु के उक्त लक्षण होने पर भी स्वर परिवर्तन का निरंतर अभ्यास किया जाय तो मृत्यु को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है।

वैसे तो शरीर में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर चलने की अवधि व्यक्ति की जीवनशैली और साधना पद्धति पर निर्भर करती है। परन्तु जनसाधारण में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर 24 घंटों में बराबर चलना अच्छे स्वास्थ्य का सूचक होता है।

दोनों स्वरों में जितना ज्यादा असंतुलन होता है उतना ही व्यक्ति अस्वस्थ अथवा रोगी होता है। संक्रामक और असाध्य रोगों में यह अन्तर काफी बढ़ जाता है।

लम्बे समय तक एक ही स्वर चलने पर व्यक्ति की मृत्यु शीघ्र होने की संभावना रहती है। इस लिए सजगता पूर्वक स्वर चलने की अवधि को समान कर असाध्य एवं संक्रामक रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है।

सजगता का मतलब जो स्वर कम चलता है उसको कृत्रिम तरिकों से अधिकाधिक चलाने का प्रयास किया जाए तथा जो स्वर ज्यादा चलता है, उसको कम चलाया जाये। कार्यों के अनुरूप स्वर का नियंत्रण और संचालन किया जाये।

रोग के अनुसार स्वर विज्ञान की विधि। Method of swar vigyan according to disease.


  1.  गर्मी सम्बन्धी रोग :- गर्मी, प्यास, बुखार, पीत्त सम्बन्धी रोगों में चन्द्र स्वर चलाने से शरीर में शीतलता बढ़ती है, जिससे गर्मी से उत्पन्न असंतुलन दूर हो जाता है।

  2.  कफ सम्बन्धी रोग:- सर्दी, जुकाम, खांसी, दमा आदि कफ सम्बन्धी रोगों में सूर्य स्वर अधिकाधिक चलाने से शरीर में गर्मी बढ़ती है। सर्दी का प्रभाव दूर होता है।

  3. आकस्मिक रोग:- प्रत्येक व्यक्ति को स्वर में होने वाले परिवर्तनों का नियमित आंकलन और समीक्षा करनी चाहिये। दिन-रात 12 घंटे चन्द्र और 12 घंटे सूर्य स्वर चलना संतुलित स्वास्थ्य का सूचक होता है।

    यदि एक स्वर ज्यादा और दूसरा स्वर कम चले तो शरीर में असंतुलन की स्थिति बनने से रोग होने की संभावना रहती है। हम स्वर के अनुकूल जितनी ज्यादा प्रवृत्तियां करेंगे, उतनी अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक लाभ अर्जित कर सकेंगे।

    स्वरोदय विज्ञान के अनुसार व्यक्ति प्रातः निद्रा त्यागते समय अपना स्वर देखें। जो स्वर चल रहा है, धरती पर पहले वही पैर रखे। बाहर अथवा यात्रा में जाते समय पहले वह पैर आगे बढ़ावे, जिस तरफ का स्वर चल रहा है। साक्षात्कार के समय इस प्रकार बैठे की साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति बंद स्वर की तरफ हो, तो सभी कार्यों में इच्छित सफलता अवश्य मिलती है।

स्वर विज्ञान के अनुसार, स्वर पर पंचमहाभूत का क्या प्रभाव है ? - According to swar vigyan , what is the effect of Panchmahabhuta on the swar ?


पंच महाभूत तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) तथा ज्योतिष के नव ग्रह की स्थिति का भी हमारे स्वर से प्रत्यक्ष-परोक्ष सम्बन्ध होता है। शरीर में प्रत्येक समय अलग-अलग तत्वों की सक्रियता होती है। शरीर की रसायानिक संरचना में भी पृथ्वी और जल तत्व का अनुपात अन्य तत्वों से अधिक होता है। सारी दवाईयां अधिक इन्हीं दो तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है।

इस लिए जब शरीर में पृथ्वी तत्त्व प्रभावी होता है, उस समय किया गया उपचार सर्वाधिक प्रभावशाली होता है। उससे कम जल तत्त्व की सक्रियता पर प्रभाव पड़ता है।


शरीर में किस समय कौनसा तत्त्व प्रभावी होता है, उनको निम्न प्रयोगों द्वारा मालूम किया जा सकता है।

विधि नं. 1

  1. यदि पीला रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में पृथ्वी तत्त्व प्रभावी होता है।
  2. यदि सफेद रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में जल तत्त्व प्रभावी होता है।
  3. यदि लाल रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में अग्नि तत्त्व प्रभावी होता है।
  4. यदि काला रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में वायु तत्त्व प्रभावी होता है।
  5. यदि मिश्रीत (अलग-अलग) रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में आकाश तत्त्व प्रभावी होता है।

विधी नं. 2

  1. जब मुख का स्वाद मधुर हो, उस समय पृथ्वी तत्त्व सक्रिय होता है।
  2. जब मुख का स्वाद कसैला हो, उस समय जल तत्त्व सक्रिय होता है।
  3. जब मुख का स्वाद तीखा हो, उस समय अग्नि तत्त्व सक्रिय होता है।
  4. जब मुख का स्वाद खट्टा हो, उस समय वायु तत्त्व सक्रिय होता है।
  5. जब मुख का स्वाद कड़वा हो, उस समय आकाश तत्त्व सक्रिय होता है।

विधि नं. 3

स्वच्छ दर्पण पर मुंह से श्वास छोड़ने पर (फूंक मारने पर) जो आकृति बनती है, वे उस समय शरीर में प्रभावी तत्व को इंगित करती है।

यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से चौकोर आकार बनता हो तो-पृथ्वी तत्व की प्रधानता

  1. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से त्रिकोण आकार बनता हो तो- अग्नि तत्व की प्रधानता

  2. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से अर्द्ध चंद्राकार आकार बनता हो तो- जल तत्व की प्रधानता

  3. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से वृताकार (गोल) आकार बनता हो तो-

  4. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से मिश्रित आकार बनता हो तो- आकाश तत्व की प्रधानता

जिज्ञासु व्यक्ति अनुभवी स्वरशास्त्री से स्वरोदय विज्ञान का अवश्य गहन अध्ययन करें। क्योंकि स्वर विज्ञान से न केवल रोगों से बचा जा सकता है अपितु प्रकृति के अदृश्य रहस्यों का भी पता लगाया जा सकता है। मानव देह में स्वरोदय एक ऐसी आश्चर्यजनक, सरल,स्वावलम्बी, प्रभावशाली, बिना किसी खर्च वाली चमत्कारी प्रणाली होती है जिसका ज्ञान और सम्यक् पालना होने पर किसी भी सांसारिक कार्यों में असफलता की अधिक संभावना नहीं रहती।
स्वर विज्ञान के अनुसार प्रवृत्ति करने से साक्षात्कार में सफलता, भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास, सामने वाले व्यक्ति के अन्तरभावों को सहजता से समझा जा सकता है। जिससे प्रतिदिन उपस्थित होने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों से सहज बचा जा सकता है।
अज्ञानवश स्वरोदय की जानकारी के अभाव से ही हम हमारी क्षमताओं से अनभिज्ञ होते हैं। रोगी बनते हैं तथा अपने कार्यों में असफल होते हैं। स्वरोदय विज्ञान प्रत्यक्ष फलदायक है, जिसको ठीक-ठीक लिपीबद्ध करना संभव नहीं। केवल जनसाधारण के उपयोग की कुछ मुख्य सैद्धान्तिक बातों की आंशिक और संक्षिप्त जानकारी ही यहां दी गई हैं।

हम यहा एह swar vigyan in hindi pdf का लिंक दे रहे है।

बका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।


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2 टिप्पणियां

Ksc ने कहा…
Gjb ka knowledge hai
अनाम ने कहा…
Thanks