20 June 2020

Self-purification is the highest necessity of life - आत्म-शुद्धि जीवन की सर्वोच्च आवश्यकता |

Self-purification is the highest necessity of life - आत्म-शुद्धि जीवन की सर्वोच्च आवश्यकता |


Self-purification is the highest necessity of life


परन्तु आज जीवन शैली का निर्धारण करते समय तथा स्वास्थ्य के सम्बन्ध में परामर्श देते समय प्रायः । अधिकांश चिकित्सा पद्धति यों और चिकित्सकों का सोच मात्र शरीर तक ही सीमित होता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी समस्त गतिविधियों के संचालन में शरीर की प्रमुख भूमिका होती है। सभी कार्य और जीवन, शरीर के अस्तित्व के बिना असंभव होते हैं। शरीर की अनुपस्थिति में, मन, बुद्धि और वाणी का भी अस्तित्व नहीं होता। फिर भी आत्मा की उपेक्षा कर मात्र शरीर का ख्याल करने का मतलब कार में पेट्रोल डाल, चालक को भूखा रखने के समान बुद्धिहीनता ही समझना चाहिए। ऐसी कार में निर्विघ्न यात्रा संभव नहीं हो सकती। अत: जीवन-यापन करते समय हम ऐसी प्रवृत्तियों से यथा -संभव बचे, जिससे आत्मा अपवित्र और विकारग्रस्त बनती हो। आत्मा को शुद्ध पवित्र एवं विकारों से मुक्त रखना हमारे जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उसका एक मात्र उपाय है - अशुभ कर्मों के बन्धनों से मुक्त जीवनचर्या जीना । आत्म-दर्शन, आत्म-निरीक्षण, आत्मोत्थान की नियमित समीक्षा करना । अध्यात्म योगी ऐसा ही जीवन जीने से अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ होते हैं। प्रतिकूलताएँ, वियोग, अभाव, परीषह, कष्ट, दुःख आदि परिस्थितियों में भी मस्त एवं प्रसन्न चित्त रहते हैं। यही सुखी एवं स्वस्थ जीवन की सच्ची आधारशिला है तथा ऐसी सोच ही स्वास्थ्य का सच्चा सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् दृष्टिकोण होता हैं।


Disregard of soul - आत्मा की उपेक्षा अनुचित


किसी तालाब को खाली करने के लिए आवश्यक है कि तालाब में पहले आते हुए पानी को रोका जाए। उसके पश्चात् तालाब में जो पानी है, उसको पम्प या अन्य विधि द्वारा खाली करना अथवा पानी को सुखाना । ठीक उसी प्रकार आत्मा को शुद्ध, पवित्र बनाने के लिए आवश्यक है कि मानव जीवन में ऐसी प्रवृत्तियों से यथा-सम्भव बचें, जो अशुभ कर्मों के बन्ध का हेतु बन आत्मा को कर्मो से विकारी बनाती है। साथ ही साथ आत्मा पर पहले से जो कर्मों का आवरण है, उसको दूर करने के लिये अनुभवी, निस्पृही, समत्व की साधना में लीन आध्यात्मिक साधकों के मार्गदर्शन में सम्यक् पुरुषार्थ करना चाहिए तथा आत्मा को परमात्मा बनाने का लक्ष्य सार्थक करना चाहिए। जब तक कर्जा नहीं उतरता व्यापारी ऋण-मुक्त नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार कर्मों को दूर किये बिना, आत्मा शुद्ध बुद्ध मुक्त नहीं बन सकती। ऐसी साधना मनुष्य योनि में ही सम्भव होती है। महावीर के दर्शन में गुणस्थान स्वरूप के आधार पर आत्मा के विकास की चौदह क्रमिक स्थितियों का विस्तृत विवेचन मिलता है, जिसका सम्यक् आचरण आवश्यक होता हैं।

मुक्त आत्मा ही परमात्मा स्वरूप होती है । यही स्थायी सम्पूर्ण स्वास्थ्य की अवस्था होती है। आत्म-साधना के लिए शरीर का स्वस्थ होना भी आवश्यक है। अत: पुस्तक में शरीर को स्वस्थ रखने हेतु ऐसे अहिंसक उपायों की ही विस्तृत चर्चा की गई, जिससे आत्मा विकारी न बने।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।


Coordination of body, mind and soul is necessary for health - स्वास्थ्य हेतु शरीर, मन और आत्मा का तालमेल जरूरी