24 June 2020

पंच महाभूत तत्व , पंच महाभूत का सिद्धान्त क्या है ?, पंच महाभूत के नाम - Five elements , What is the principle of Panch Mahabhut?, Name of Panch Mahabhut

पंच महाभूत तत्व , पंच महाभूत का सिद्धान्त क्या है ?, पंच महाभूत के नाम - Five elements , What is the principle of Panch Mahabhut?, Name of Panch Mahabhut


पंच महाभूत तत्व , पंच महाभूत का सिद्धान्त क्या है ?, पंच महाभूत के नाम -



पंच महाभूत के नाम - Name of Panch Mahabhut


(1) पृथ्वी तत्त्व - Earth element, (2) जल तत्त्व - Water element , (3) अग्नि तत्व - Fire element , (4) वायु तत्व - Air element , (5) आकाश तत्व - Sky element


भारतीय प्राचीन चिकित्सा पद्धति के अनुसार संसार के सभी चल अचल पदार्थों की संरचना में आकाश, वायु, अग्नि, पानी और मिट्टी अर्थात् पृथ्वी आदि पंच महाभूत तत्वों की अहं भूमिका होती है। तुलसी दास जी ने भी कहा है – “क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच रचित यह उद्यम शरीरा।" उनकी इस मान्यतानुसार शरीर के निर्माण, संचालन, नियंत्रण का प्रमुख आधार भी ये पंच महाभूत होते हैं। पंच तत्त्वों के सहयोग से ही अधिकांश गतिविधियाँ होती हैं। आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र आदि में शारीरिक रोगों का एक प्रमुख कारण इन पांच तत्वों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारणों से असंतुलन माना गया है।


प्रत्येक व्यक्ति में इन पांचों तत्वों का अलग-अलग अनुपात होता है। किसी में कोई तत्व अधिक होता हैं तो, किसी अन्य में दूसरा तत्व अधिक होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार समस्त ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति में पंच तत्वों की भिन्नता के अनुसार अलग-अलग होता है। इसी कारण दो जुड़वा भाई अथवा बहनों का स्वभाव चरित्र और जीवन एक जैसा नहीं होता।


शरीर में पंच तत्व का प्रभाव द्रव्य, क्षेत्र , काल और भावों के अनुसार बदलता रहता है। हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी कोई तत्व प्रभावी होता है तो थोड़े समय पश्चात् अन्य तत्व । प्रत्येक तत्व के तरंगों की गति, उनके स्वाद, सुगंध, स्पर्श आदि की संवेदनाएँ और अभिव्यक्ति अलग-अलग होती हैं। वैसे प्रत्येक तत्व का संबंध सारे शरीर, मन और मस्तिष्क से होता है। फिर भी वे शरीर की विभिन्न क्रियाओं, अंगों, अवयवों, संवेदनाओं को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करते हैं।


मनुष्य शरीर के प्रत्येक भाग में ये पाँचों तत्व होते हैं। फिर भी अलग-अलग भागों में इन पाँचों तत्वों का अनुपात अलग-अलग होता है। उसी के अनुरूप प्रत्येक अंग अवयव अलग-अलग, अपना-अपना कार्य करते हैं। अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए कुछ स्वभाविक तो कुछ व्यक्ति की इच्छानुसार प्रवृत्ति करने में सहयोग करते हैं। शरीर में इन पंच तत्वों के अनुरूप अवयव बनते हैं और अन्य गतिविधियाँ होती है। पंच तत्वों के आवश्यक अनुपात के असंतुलन से रोग और संतुलन से आरोग्य की प्राप्ति होती है।


पंच महाभूत का सिद्धान्त क्या है ? - What is the principle of Panch Mahabhut?,



पृथ्वी तत्त्व - Earth element


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पृथ्वी ठोस होती है। अतः शरीर में जो ठोस पदार्थ होते हैं वे पृथ्वी तत्त्व से अधिक प्रभावित होते हैं। जैसे हड्डियाँ, मांस पेशियाँ, त्वचा, नाखून, बाल इत्यादि। पांचों तत्त्वों में पृथ्वी तत्त्व सबसे भारी होता है । पृथ्वी सभी को आधार देती है। शरीर में पैर उठते-बैठते, चलते-फिरते प्रायः शरीर को आश्रय देते हैं। शरीर का भार वहन करते हैं। पगथली से लेकर गुदा तक पृथ्वी तत्व शरीर में अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय होता है। अतः पैर सम्बन्धी रोगों में प्रायः पृथ्वी तत्व के असंतुलन की संभावनाएँ अधिक रहती है। साथ ही पृथ्वी तत्व की कमी से शरीर में दुर्बलता, कमजोरी, झुरियाँ पड़ना आदि हो जाते हैं, परन्तु इसके बढ़ने से मोटापा हो जाता है।


पृथ्वी तत्त्व के असंतुलन से शरीर में जड़ता बढ़ती है। किसी कार्य में एकाग्रता नहीं रहती तथा निर्णय लेने की क्षमता कम विकसित होती है। पृथ्वी तत्व घ्राणेन्द्रिय के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। जिनकी घ्राणेन्द्रिय सक्रिय होती है, उनमें पृथ्वी तत्व का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होता है। मन में दया, कोमलता का भाव, जोखिम उठाने की क्षमता, मस्तिष्क में भारीपन आदि का पृथ्वी तत्व से संबंध होता है।

प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा आहार में सुधार और मिट्टी के उपचार द्वारा पृथ्वी तत्व के असंतुलन को दूर किया जाता है।


जल तत्त्व - Water element


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जल तत्व पृथ्वी तत्व से हल्का और तरल होता है। अतः धरती पर जल रहता है। पृथ्वी ही उसका आधार होती है। उसका बहाव सदैव नीचे की तरफ होता है। शरीर में गुदा से नाभि तक के भाग में जल तत्त्व की अधिकता होती है। शरीर में जितने तरल पदार्थ होते हैं, जैसे-रक्त, वीर्य, लासिका, मल, मूत्र, कफ, थूक, पसीना, मज्जा आदि का संबन्ध जल तत्त्व से अधिक होता है।


जल तत्त्व की कमी से शरीर में शुष्कता, त्वचा सम्बन्धी रोग, बालों का समय से पूर्व सफेद होना, प्यास अधिक लगना जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं। जबकि जल तत्त्व की अधिकता से कफ का बढ़ना, पसीना ज्यादा आना, पेशाब अधिक लगना आदि स्थितियाँ बनती है। शरीर में जल तत्व की अधिकता वाले अधिक भावुक और आसक्ति रखने वाले होते हैं। आलस्य और निद्रा की अधिकता रहती है एवं कठिन कार्य करने में अपनी मानसिकता देरी से बना पाते


जल तत्त्व के असंतुलन से व्यक्ति में आलस्य बढ़ने लगता है। कठोर, परिश्रम वाले कार्यों के करने में कठिनाई अनुभव होती है। स्वभाव में रूखापन होने लगता है। गहरी निद्रा नहीं आती। बात-बात में आवेग आने लगते हैं। जल तत्त्व की अधिकता वाले रसनेन्द्रिय के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। खाने पीने की चीजों के बारे में जल्दी प्रतिक्रिया करते हैं। शुद्ध जल के सेवन, सब्जियों, फलों के रस और अन्य तरल पदार्थों के सेवन से शरीर में जल तत्त्व की पूर्ति होती है।


प्राकृतिक चिकित्सक पानी का अलग-अलग प्रकार से शरीर में उपयोग करवा कर, उषापान, वाष्प स्नान, टब बाथ, एनिमा, नेति एवं अन्य जल सम्बन्धी क्रियाओं द्वारा जल तत्त्व को संतुलित करते हैं।


अग्नि तत्व - Fire element


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अग्नि एक ऊर्जा है, जिसका गुण है उष्णता । अग्नि जल से भी हल्की होती है और उसका स्वभाव ऊपर की तरफ उठना होता है। शरीर में नाभि से हृदय तक के भाग में इस तत्व की अधिकता होती है। नाभि का क्षेत्र जल तत्व और अग्नि तत्व के प्रभाव में रहता है । शरीर की उष्णता, जोश, उत्तेजना, स्फूर्ति आदि अग्नि तत्व से विशेष सम्बन्धित होते हैं।


अग्नि तत्व के असंतुलन से भूख और प्यास बराबर नहीं लगती। स्वभाव में चिड़चिड़ापन, शारीरिक ताकत में बदलाव, आंखों का तेज कम होने लगता है। पाचन बराबर नहीं होता। मस्तिष्क, सूर्य केन्द्र एवं प्रजनन संबंधी रोगों की संभावना बढ़ जाती है। चर्म रोग, जोड़ों का दर्द होने लगता है। धूप सेवन से शरीर में अग्नि तत्व की पूर्ति होती है। अग्नि तत्त्व की अधिकता से बुखार आना, शरीर में जलन होना, पित्त बढ़ना, भूख और प्यास ज्यादा लगना, क्रोध अधिक आना, भोग की इच्छा होना आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। अग्नि तत्व का संबंध हमारी चक्षु इन्द्रिय से अधिक होता है। अग्नि तत्व की अधिकता वालों की दृष्टि बड़ी पैनी होती है। व्यायाम, धूप स्नान एवं - सूर्य प्राणायाम से अग्नि तत्व बढ़ता है। जबकि आराम, निद्रा और चन्द्र प्राणायाम से अग्नि तत्व कम होता है।


वायु तत्व - Air element


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वायु अग्नि से भी हल्की होती है । अत: अग्नि से ऊपर वाले शरीर के भागों में इसकी अधिकता होती है। शरीर में हृदय से कंठ तक वायु अपेक्षाकृत अधिक होती है। प्रायः वायु अस्थिर होती है। अत: शरीर में हलन-चलन, संकोचन, फैलने वाली गतिविधियों में इसकी प्रभावी भूमिका होती है। वायु तत्व की अधिकता वाले व्यक्ति स्पर्शेन्द्रिय के प्रति विशेष संवेदनशील होते हैं।


वायु तत्व के आवश्यक अनुपात में कमी होने से सम्बन्धित अंगों का हलन-चलन, श्वसन, रक्त प्रवाह लासिका प्रवाह तथा शरीर में गतिशील अंगों में रोग होने की संभावना रहती है। शरीर में कम्पन अथवा खिंचाव भी हो सकता है। चिंता और भय लगने लगता है। फेंफड़ें हृदय, गुर्दे आदि अंग विशेष प्रभावित होते हैं। वायु का अवरोध बढ़ने से गंठिया हो सकता है। 


सही ढंग से पूरा, गहरा, दीर्घ श्वांस अथवा प्राणायाम से शरीर में वायु तत्व की पूर्ति होती है।


आकाश तत्व - Sky element


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आकाश खाली होता है। सभी को स्थान देता है। अतः शरीर में जहाँ-जहाँ रिक्तता होती है, वे भाग आकाश तत्व से सम्बन्धित होते हैं । आकाश तत्व की अधिकता वालों की श्रोत्रेन्द्रिय अधिक संवेदनशील होती है। वे प्रत्येक बात को अधिक ध्यान से सुनते हैं। आकाश तत्व चारों तत्वों को स्थान देता है। हमारे शरीर में पाँचों इन्द्रियों (आंख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श) के माध्यम से जो ग्रहण किया जाता है उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जो कुछ होता है, उसका सम्बन्ध आकाश तत्व से होता है। जैसे काम, क्रोध, मोह, लोभ, लज्जा इत्यादि । आकाश को निहारने, खुले आकाश में उठने, बैठने, चलने, फिरने, सोने अथवा उपवास करने से इस तत्व की पूर्ति होती है।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।


पंच तत्वों का शारीरिक अवयवों एवं प्रवृत्तियों से संबंध - The relationship of the five elements to the physical components and tendencies

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