02 August 2020

present form of yoga 2021 योग का वर्तमान स्वरूप

present form of yoga 2021

 योग का वर्तमान स्वरूप 



 योग का वर्तमान स्वरूप : present form of yoga 2021

आजकल विश्व भर में प्रचलित एवं प्रसारित योगाभ्यास प्रायः आसन और प्राणायाम तक सीमित होता जा रहा है। यम, नियम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभाव में नर से नारायण और आत्मा को परमात्मा बनाने वाली योग साधना मात्र शरीर का व्यायाम बन कर रह गया है। यह योग का अवमूल्यन है, अष्टांग योग की क्रमिक साधना ही सच्चा योग है।

ठीक इसी प्रकार आज ध्यान भी एक फैशन का रूप लेता जा रहा है। शारीरिक रोगों के उपचार तक सीमित होता जा रहा है। बिना यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा के ध्यान साधना स्थायी रूप से फलीभूत नहीं हो सकती। आज ध्यान कराया जाता है, ध्यान किया जाता है, परन्तु वास्तव में बहुत कम व्यक्तियों के ही ध्यान होता है। ध्यान में सच्चे आनंद और शांति की अनुभूति होती है। आज ध्यान के नाम से जितनी भी पद्धतियाँ प्रचलित हैं, चाहे वे किसी नाम से हों, ध्यान द्वारा एक बार आत्मा की अनंत शक्तियों का अनुभव करने वाला, शरीर और आत्मा का भेदज्ञान करने वाला ध्यान, ध्यानी को सांसारिक भौतिक उपलब्धियों में कैसे उलझा सकता है ? जिसका ध्यान की उपलब्धियों के लम्बे चौड़े अनुभव करने वालों को स्पष्टीकरण करना चाहिये। आज ध्यानियों के जीवन में समभाव की प्राप्ति और कषायों की मंदता प्राय: क्यों नहीं बढ़ रही है? उनकी सहनशीलता क्यों घट रही है ? साधारण से वियोग और प्रतिकूलताओं में वे अपना संतुलन क्यों गंवा कर विचलित हो जाते हैं? उन्हें प्रसिद्धि की भूख क्यों परेशान कर रही है ? उनके जीवन में मायावृत्ति क्यों और कैसे पनप रही है ?

ध्यान कोई पोशाक नहीं है कि जब चाहे पहन लें और जब चाहें उतार कर फैक दें। ध्यान का मापदंड होता है:- कषायों की मंदता, कामनाओं एवं आत्म-विकारों की कमी, आत्म विकास में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि । जिस प्रकार खेती गेहूँ के लिये की जाती है, घास के लिये नहीं। घास तो गेहूँ के साथ स्वत: उपलब्ध हो जाती है। जिस ध्यान से व्यक्ति अंतर्मुखी न बने वह ध्यान अधूरा ही होता है। रोगों में राहत को ही ध्यान की परिपूर्णता मानना बुद्धिमत्ता पूर्ण नहीं कहा जा सकता । ऐसा प्रयास मात्र घास के लिए खेती करने के समान अपने समय, श्रम और क्षमताओं के अवमूल्यन का ही प्रतीक होता है। ध्यानी अप्रमादी अर्थात् अपने जीवन मूल्यों के प्रति शत प्रतिशत सजग और जागृत होता है। जिस प्रकार अंधकार और प्रकाश साथ रह नहीं सकता, ठीक उसी प्रकार प्रमाद (असजगता) दूर हुये बिना सच्चा ध्यानी नहीं बना जा सकता।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।

01 August 2020

Ashtanga yoga by patanjali in hindi - 2021 योग क्या है? योग का महत्व और योग के लाभ।

Ashtanga yoga by patanjali in hindi - 2021 

योग क्या है?  योग का महत्व और योग के लाभ।


Ashtanga yoga by patanjali in hindi - 2021


योग शब्द 'युज्' धातु से बना हैं। जिसका शाब्दिक अर्थ है जुड़ना मिलना। जब व्यक्ति अपनी आत्मा से जुड़ जाता है तथा उससे साक्षात्कार कर लेता है तो वह स्वयं को नर से नारायण और आत्मा को परमात्मा बना देता है। योग सुखी जीवन जीने की सरल एवं प्रभावशाली श्रेष्ठ विधि है। जिसके द्वारा मनुष्य का शरीर पूर्ण स्वस्थ, इन्द्रियों में अपार शक्ति, मन में अपूर्व आनंद बुद्धि में सही ज्ञान एवं भावों में कषयों की मंदता और सजगता आती है, वही सच्चा योग होता है। योग साधना से मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो सकता है। योग द्वारा शरीर से रोग, इन्द्रियों से थकावट और कमजोरी, मन से चिंता, भय, तनाव, आवेगों से अपने आपको मुक्त रखा जा सकता है। वर्तमान में प्रचलित योग का मुख्य आधार पातंजलि द्वारा निर्धारित अष्टांग योग साधना है। पातंजलि ने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ध्यान और समाधि के द्वारा योग के आठ अंगों का क्रमानुसार निर्देश किया है। जिसकी सही विधि से क्रियान्विति करने पर मनुष्य अपने परम लक्ष्य मोक्ष तक को प्राप्त कर सकता है। योग की सारी साधना व्यक्ति के स्वयं के सही पुरुषार्थ पर ही निर्भर करती है। जो मानव की सही जीवन शैली का ही रूप होता है। योग शरीर को विशेष प्रकार से मोड़ना अथवा घुमाना मात्र व्यायाम ही नहीं है, अपितु मन, वचन और काया का सही संयम, तालमेल और संतुलन ही सच्चा योग होता है। वास्तव में योग सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् आचरण की उत्कृष्ट साधना है। जिससे शरीर, मन और आत्मा ताल से ताल मिलाकर कार्य करते हैं। तीनों के विकारों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा तीनों निर्विकारी बनते हैं। यही मनुष्य जीवन का ध्येय होता है।


यम : यम योग की परिभाषा ;


यम का मतलब होता है निग्रह अर्थात् छोड़ना । हम जीवन में क्या छोड़ें? क्यों छोड़ें? हमारे जीवन को जो विकारी बनाते हैं, पतित बनाते हैं, जीवन के लिए जो अकरणीय हैं, उनको छोड़ें बिना जीवन का विकास हो नहीं सकता। पातंजलि ने ऐसे पांच यमों को योग की आधारशिला माना है। ये पांच यम हैं हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन या व्यभिचार तथा परिग्रह का त्याग । मनुष्य की सारी प्रवृत्तियाँ तीन करण द्वारा होती है। जैसे स्वयं किसी कार्य को करना, दूसरों से किसी कार्य को करवाना तथा तीसरा किसी कार्य करने वालों की अनुमोदना या प्रशंसा करना । उसके साथ तीन में से कोई न कोई योग अवश्य होता है। ये तीन योग हैं, मन का योग, वचन का योग और काया का योग । जैसे किसी कार्य को मन से करना, वाणी से करना, काया से करना । अन्य से करवाना अथवा कार्य करने वालों की मन, वाणी या काया से अनुमोदना करना, सहयोग देना। बिना करण और योग के कार्य हो नहीं सकता। किसी प्रवृत्ति के लिए कम से कम तीन करण और तीन योग में से एक करण और एक योग का होना अनिवार्य होता है। सच्चा साधक इन पाँचों यमों का पूर्ण रूप से तीन करण और तीन योग से जीवन भर पालन करता है। उसके लिए संकल्प बद्ध होता है। अतः उनके वतों को महावत कहते हैं। जैसे- जीवन पर्यन्त मन, वचन और काया से किसी जीव को न तो स्वयं कष्ट पहुंचाना, न किसी अन्य व्यक्ति से कष्ट पहुंचाने में सहयोगी बनना और न प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से किसी भी चेतनाशील प्राणी को कष्ट पहुंचाने वाले को प्रोत्साहित करना, अच्छा न मानना ही हिंसा का पूर्णतः त्याग होता है। हिंसा-अहिंसा को जानने के लिए जीव क्या है? अजीव क्या है, का जानना, समझना आवश्यक है? उसके बिना पूर्ण अहिंसा का पालन कैसे संभव हो सकता है? परन्तु आज के मानव ने हिंसा को मात्र मानव तक सीमित कर दिया है। स्वार्थवश अन्य जीवों को कष्ट पहुंचाते उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता। वनस्पति और पानी में भी आधुनिक विज्ञान ने जीव माना है परन्तु उनका दुरुपयोग करते प्राय: अधिकांश अहिंसक कहलाने वाले मानव तनिक भी नहीं हिचकिचाते । पृथ्वी, वायु और अग्नि में भी जीव होते हैं। इस लिए उनका कैसे उपयोग किया जाये, जानना और समझना आवश्यक है। आज पर्यावरण की सारी समस्याओं का कारण उनके प्रति हमारा अज्ञान और अविवेक ही हैं। हिंसा का मतलब किसी जीव को कष्ट पहुँचाना, प्रताड़ित करना, मारना आदि । दुःख देने से दुःख मिलता है। यह प्रकृति का सनातन सिद्धान्त हैं। हिंसा दो प्रकार की होती है। प्रथम द्रव्य हिंसा तथा दूसरी भाव हिंसा। वर्तमान में मात्र द्रव्य हिंसा तक ही हमारा सोच प्राय: सीमित होता जा रहा है। परन्तु द्रव्य हिंसा की जड़ भाव हिंसा ही होती है। जिसके मूल कारण होते हैं आसक्ति , अनैतिकता, अनावश्यक कामनाएँ, धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक उन्माद, जातिवाद, प्रान्तवाद, राष्ट्रवाद की संकीर्ण भावना तथा इन सब के मूल में होता है आध्यात्मिक चेतना का अभाव, स्वछन्द एवं संकीर्ण स्वार्थी मनोवृत्तियाँ । ये ही वे कारण है, जो दूसरों के साथ निर्दयता, क्रूरता और दुःख देने जैसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते हैं, तथा हिंसा को बढ़ावा देते हैं। रोग भी एक प्रकार का दुःख है। इस लिए हमें अन्य जीवों को किसी भी प्रकार से प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से कष्ट नहीं देना चाहिये। यही स्वास्थ्य अथवा योग साधना की प्रारम्भिक भूमिका होती है।

मन में जैसा सही ज्ञान से सोचा समझा हो, आंखों से जैसा जो कुछ देखा हो और कानों से जैसा जो कुछ सुना हो उसे ठीक वैसा ही अभिव्यक्त न करना झूठ कहलाता है और वैसा ही प्रस्तुतिकरण करना सत्य कहलाता है। किसी की वस्तु को बिना पूछे लेना चोरी कहलाता है। समस्त इन्द्रियों के विषय विकारों पर संयम न रखना असंयम कहलाता है और उनका संयम ब्रह्मचर्य होता है। जबकि परिग्रह का मतलब धन, परिवार और अन्य भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति भाव या लगाव होना । इस लिए योगाभ्यास करने से पूर्व प्रत्येक साधक के लिए इन दुर्गुणों को त्याग कर अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन आवश्यक होता है। जो योग की सफलता की आधारशिला है। बिना नींव के मकान बन नहीं सकता। बिना जड़ के वृक्ष विकसित नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार यम के पालन के बिना योग का सम्पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो सकता, मात्र शरीर की कार्य क्षमता बढ़ती है। यमों के पालन की कोई सीमा अथवा अवधि नहीं होती। वे सदैव सभी परिस्थितियों में प्राथमिकता के आधार पर आचरणीय होते हैं। जैन संतों के पांचों यमों के पूर्णतया पालन का संकल्प होता है तथा सच्चे आत्मार्थी साधु आज भी उनका पालन करते देखे जा सकते हैं। जैन साधुओं के आचरणीय पाँच महाव्रत और पातंजलि योग में वर्णित पांच यम पूर्ण रूप से समान हैं।


नियम : योग मे नियम क्या है ?


नियम अथवा सिद्धान्त जीवन की वे प्रवृत्तियाँ हैं, जो योग के लिए अनिवार्य होती है तथा जो यम के पालन में सहयोग करते हैं। मुख्य नियम भी पांच हैं। शौच अर्थात् शुद्धता, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान । शौच का मतलब मन, वाणी और काया की पवित्रता अर्थात् आत्मा की विकारों से शुद्धि । संयोग-वियोग, अनुकूल-प्रतिकूल, लाभ-हानि के प्रसंगों पर सदैव प्रसन्नचित्त रहना, विचलित न होना अर्थात् समभाव रखना ही संतोष कहलाता है। सुख दुःख, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास जैसे कष्टों को आत्म शुद्धि के लिए सम्यक् दृष्टिकोण से की जाने वाली मन, वचन और काया की साधना को तप कहते हैं । तप का मतलब है जो आत्मा को तुरन्त पवित्र करे। जिस प्रकार अग्नि में सोना तपाने से उसका मेल दूर हो जाता है सोना शुद्ध हो जाता है। ठीक उसी प्रकार तप की अग्नि से शरीर की इन्द्रियाँ, मन और आत्मा के विकार भी दूर हो जाते हैं। तप मुख्यतया दो प्रकार का होता है। पहला बाह्य तप जिसके द्वारा पांचों इन्द्रियों और मन की बाह्य अशुभ प्रवृत्तियों को त्यागा जाता है। दूसरा है आन्तरिक तप । जो व्यक्ति को अन्तर्मुखी बनाता है।

स्वयं के द्वारा स्वयं के स्वरूप का सम्यक् चिन्तन, मनन, निरीक्षण, परीक्षण और समीक्षा करना स्वाध्याय कहलाता है। जैसे मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ? क्यों आया हूँ? मुझे कहाँ जाना है? मैं कहाँ जाऊंगा? मैं अपने लक्ष्य को कैसे प्राप्त करूँगा? जन्म से पूर्व मेरा क्या अस्तित्व था और मृत्यु के पश्चात् मेरी क्या स्थिति होगी? आत्मा क्या हैं? क्या मैं मात्र शरीर हूँ ? मेरे सारे संयोग-वियोग का संचालक कौन है? मेरे जीवन का सही उद्देश्य क्या है? आत्मा और शरीर का क्या संबंध हैं? तन में व्याधि, मन में संकल्प-विकल्प, इच्छा-कामना, स्मृति-विस्मृति आदि का मूल क्या है? सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र आदि का सम्यक् चिन्तन करना स्वाध्याय कहलाता है।

आत्मा की कर्मों से मुक्तावस्था, शुद्धावस्था परमात्मा का स्वरूप होती है। इस लिए  मन, वचन और काया से ऐसी प्रवृत्तियाँ करना जिससे आत्मा परमात्मा बन जाए, ईश्वर प्राणिधान कहलाता है।

यम नियम के पालन से शरीर के अवयव रसायनयुक्त हो जाते हैं। उनमें रोग प्रतिकारात्मक क्षमता बढ़ जाती है तथा मनोबल मजबूत हो जाता है। विकार दूर हो जाते हैं। समभाव की प्राप्ति होने से मन और मस्तिष्क में सन्तुलन हो जाता है। जो स्वास्थ्य की आधार शिला होती है। बिना यम नियम के पालन से योग का आंशिक लाभ ही मिलता है।

यम का सदैव एवं पूर्णता के साथ पालन करना आवश्यक होता है। उसमें किसी प्रकार की छूट नहीं होती परन्तु नियम अथवा मर्यादाओं के पालन में परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन भी हो सकता है। नियम से यम पुष्ट होते हैं।


आसन : योग और आसन में क्या अंतर है ?आसन क्या है ?


आसन : योग और आसन में क्या अंतर है ?आसन क्या है ?


यम नियम के पालन से व्यक्ति अपनी क्षमताओं से परिचित हो जाता है। जीवन का सही उद्देश्य समझ में आ जाता है। उसकी प्राथमिकताएँ बदल जाती है। वह अपना अवमूल्यन नहीं करता। उसका मनोबल और आत्मबल बढ़ जाता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता और सहनशक्ति बढ़ जाती है।

यम नियम का अपनी क्षमतानुसार अधिकाधिक पालन करने के पश्चात् ही पातंजलि ने अष्टांग योग में आसन को रखा। आसन शरीर की वह स्थिति है जिससे शरीर बिना किसी बैचेनी के स्थिर रह सके और मन को सुख की प्राप्ति हो। आसन करने से मांस पेशियों में खिंचाव होता है। जिससे उनका विकास होता है। सुस्ती दूर होती है। शरीर में हल्कापन आता है। नाड़ियों की शुद्धि, स्वास्थ्य की वृद्धि एवं तन मन में सक्रियता आती है।

आसन व्यायाम का ही वैज्ञानिक रूप होता है। आसनों से शरीर के ऊर्जा केन्द्र जागृत होते हैं और शरीर में आवश्यक हारमोन्स बनाने वाली अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ बराबर कार्य करने लगती है। आसनों के अलावा प्रायः अन्य कोई ऐसा सरल व्यायाम नहीं होता जिससे शरीर के सभी अंगों की यथोचित कसरत हो सके।

योग साधकों के लिए अन्य व्यायामों की अपेक्षा आसन ही अधिक उपयोगी होते हैं। आसन में, अन्य पहलवानी जैसे, कठिन व्यायामों जितनी ऊर्जा खर्च नहीं होती, जिसकी पूर्ति के लिए अधिक मात्रा में पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है। राजसिक एवं पौष्टिक आहार से इन्द्रियाँ उत्तेजित होती है, वृत्तियाँ राजसिक और तामसिक बनती है। परन्तु योगी के लिए अल्प सीमित और सात्विक आहार लेने का ही विधान होता है। इस लिए योगियों के लिए आसन ही श्रेष्ठतम व्यायाम होता है।

स्वर्गीय जैनाचार्य आत्मारामजी महाराज के अनुसार आसन वह शारीरिक साधना है, जिसके द्वारा शरीर की समस्त जीवन प्रक्रिया को नियन्त्रित किया जाता है, श्वास-प्रश्वास को बल दिया जाता है। शरीर के रक्तसंचार को सुव्यवस्थित एवं शुद्ध किया जाता है। इस प्रकार शरीर को आलस्य से मुक्त कर साधना के योग्य बनाया जाता है।

आसन से दृढ़ता आती है। नाड़ी तंत्र मजबूत होता है। सभी जैन तीर्थंकरों एवं बुद्ध की मूर्तियाँ प्राय: पदमासन में ही मिलती है। भगवान महावीर की सारी साधना अलग-अलग आसनों में हुई। नमाज पढ़ने के लिये तथा जैन धर्म में प्रतिक्रमण की आराधना करते समय विविध आसनों तथा वंदन करते समय विशेष आसन का विधान होता है। आसन से एकाग्रता बढ़ती है।


प्राणायाम : योग मे प्राणायाम क्या है ?


प्राणायाम : योग मे प्राणायाम क्या है ?


शरीर को निश्चित अवधि के लिए आत्मा के रहने योग्य बनाये रहने की क्षमता हेतु जिस तत्त्व की प्रधान भूमिका होती है, उसे प्राण कहते है तथा उसकी ऊर्जा को प्राण ऊर्जा कहते हैं प्राण के आधार पर ही मानव प्राणी कहलाता है । प्राण सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के बीच का संबंध सूत्र होता है, जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर से जोड़ता है। प्राण ऊर्जा पंच महाभूत तत्वों (पृथ्वी, पानी, हवा, अग्नि, आकाश) के साथ मिलकर उन्हें उपयोगी बनाती



प्रत्याहार :
प्रत्याहार योग परिभाषा :


प्रत्याहार :  प्रत्याहार योग परिभाषा :

शरीर की वह अवस्था जब पाँचों इन्द्रियाँ शांत हो अपने बाह्य विषयों से मुक्त होकर अन्तर्मुखी हो जाती है, प्रत्याहार कहलाती है । इस अवस्था में मन की स्वछन्दता समाप्त हो जाती है। चित्त शांत रहने लगता है। साधक को अपनी आत्मिक शक्तियों का आभास होने लगता है।

" शब्द आया , चला गया, उसके अर्थ पर ध्यान न देना । देखा, अनदेखा कर देना उस पर चिन्तन नहीं करना । जिस प्रकार पानी बर्फ बनने के पश्चात ही छलनी में टिक सकता है, ठीक उसी प्रकार प्रत्याहार में पांचों इन्द्रियों के विषयों से ध्यान हटा लिया जाता है। प्रत्याहार को जैनागमों में प्रतिसंलीनता कहते हैं।


धारणा : योग धारणा , धारणा क्या है ?


शांत चित्त को शरीर के किसी स्थान पर एकाग्र करने को धारणा कहते हैं। धारणा ध्यान की प्रारम्भिक अवस्था होती है।

ध्यान :

ध्यान : ध्यान की परिभाषा, ध्यान का अर्थ।


ध्यान की परिभाषा, ध्यान का अर्थ।

धारणा से चित्त वृत्ति को जिस विषय में लगाया गया हो, उसी विषय में उसे निरन्तर लगाए रखने को ध्यान कहते हैं । मन, वचन और काया की स्थिरता को भी ध्यान कहते हैं। चित्त विक्षेप का त्याग करना ध्यान है, एकाग्र चिन्तन ध्यान होता है।

ध्यान के लाभ :

प्रत्येक इन्द्रिय पर ध्यान का अभ्यास करने से अतीन्द्रिय ज्ञान होने लगता है तथा साधक बाह्य वस्तुओं के आलंबन से उनके विषयों का आनंद ले सकता है। अलग-अलग वर्ण, गंध, रस, शब्द, स्पर्श पर ध्यान करने से शरीर में उनके अभावों की पूर्ति होने लगती है तथा शरीर शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक रूप से संतुलित होने लगता है अर्थात पूर्ण स्वस्थ एवं रोग मुक्त बन सकता है। रंग चिकित्सा में शरीर में रंगों की कमी को पूरा करने की एक विधि संबंधित रंग का ध्यान कर रोगोपचार की भी होती है। इसी प्रकार शरीर में कमी वाले शब्द गंध, रस, स्पर्श का ध्यान करने से उसकी पूर्ति की जा सकती है। ध्वनि चिकित्सा, स्वाद चिकित्सा, गंध चिकित्सा, स्पर्श चिकित्साएँ आदि इसी सिद्धांत पर कार्य करती है। नासाग्र पर ध्यान करने से साधक का शक्ति केन्द्र (मूलधारा चक्र), जागृत होने लगता है एवं वृत्तियों का परिष्कार होने लगता है। जैनागमों में भगवान महावीर द्वारा नासाग्र पर ध्यान करने का अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है


ध्यान के प्रकार :


ध्यान से मन के विकारों का नाश हो जाता है और सात्विक गुणों का विकास होता है। जैन आगमों में चार प्रकार के ध्यान का उल्लेख मिलता है। आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान । प्रथम दो ध्यान अशुभ एवं त्याज्य होते हैं। जिस ध्यान में अभावों के चिन्तन से चिन्ता होती है, उस ध्यान को आर्तध्यान तथा क्रूर चित्त द्वारा किया गया ध्यान रौद्र ध्यान की श्रेणी में आता है। अंतिम दो ध्यान धर्म ध्यान और शुक्ल शुभ होते हैं। धर्म ध्यान से ध्यानी आत्म स्वभाव में रमण करने लगता है तथा शुक्ल ध्यान से राग एवं द्वेष को जीतने की क्षमता प्राप्त होती है। यह ध्यान आत्मा के शुद्ध स्वरूप की सहज अनुभूति कराता है। अत: इन दो ध्यानों को ही सम्यक् ध्यान कहा जा सकता है। बिना धर्म एवं शुक्ल ध्यान किया जाने वाले ध्यान का आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व नहीं होता। परन्तु आज अधिकांश प्रचलित ध्यान पद्धतियों का उद्देश्य व्यक्ति में तनाव से मुक्ति दिलाने, एवं उसके फलस्वरूप होने वाले स्वास्थ्य लाभ तक ही सीमित हो रहा है, जो मात्र ध्यान की प्रारम्भिक अवस्थाएं ही होती है। प्रत्येक व्यक्ति वैसे तो सजगता और एकाग्रता से प्रवृत्ति करते समय किसी न किसी ध्यानावस्था में होता ही है। परन्तु योग में ध्यान का मतलब सम्यक ध्यान । अन्तर्मुखी बनने, आत्मा से साक्षात्कार को ही ध्यान समझा जाता है। ध्यान शरीर, मन एवं मस्तिष्क को स्वस्थ रखने का अच्छा माध्यम है। ध्यान से आभा मण्डल शुद्ध होता है, हानिकारक तरंगें दूर होती है। ध्यान की साधना शांत, एकान्त, स्वच्छ एवं निश्चित स्थान पर निश्चित समय करने से ज्यादा लाभ होता है। ध्यान के लिए मौन आवश्यक होता है । पहले शरीर की स्थिरता, फिर दृढ़ता और धैर्य बिना, ध्यान संभव नहीं हो सकता।


समाधि : समाधि का अर्थ ।


समाधि : समाधि का अर्थ ।

जब केवल ध्येय स्वरूप का ही भान रहे, ध्यान की उस अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि ध्यान की चरम सीमा होती है, जिसे कायोत्सर्ग भी कहते हैं। जिसमें शरीर, मन और वाणी की प्रवृत्तियाँ समाप्त हो जाती है और साधक मुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

समाधि अथवा कायोत्सर्ग में शिथिलिकरण के साथ साथ सजगता, ममत्व का विसर्जन और भेद विज्ञान का चिन्तन आवश्यक होता है। जबकि शवासन में केवल शिथिलिकरण होता है।


ध्यान और समाधि में अंतर।

अष्टांग योग के प्रथम पांच अंगों अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को बहिरंग योग तथा अन्तिम तीन धारणा, ध्यान और समाधि को संयम कहा जाता है। यदि बहिरंग योग को विवेक पूर्वक जीवन में उतारा जाये तो मनुष्य में मानवीय गुणों के विकसित होने के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास भी होता है, जो स्वस्थ जीवन का मूलाधार होता है।

पातंजलि योग में यम नियमों द्वारा अन्तः चेतना की सफाई के बाद आसन, प्राणायाम से शरीर बलवान होता है। वहीं प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से मनोबल और आत्म बल बढ़ता है । जिस प्रकार फूटे हुये घड़े को छिद्र बन्द करने के पश्चात ही पानी से भरा जा सकता है। अच्छी फसल के लिए खेती की जीव जन्तुओं से रक्षा और खाद देने के साथ-साथ, पानी से नियमित सींचन और धूप की भी आश्यकता होती है। योग साधना ऐसी ही खेती है, जिसे यम-नियम द्वारा हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, लोभ, मलिनता, तृष्णा, आलस्य, अज्ञान अहं जैसे दस प्रकार के दुर्गुणों रूपी हानिकारक आत्मिक विकारों से रक्षा करनी होती है और आसनों का खाद तथा प्राणायाम का पानी देना होता है, तभी संतोषजनक स्वास्थ्य की उपलब्धि होती है। शरीर आकर्षक और पुष्ट बनता है। शरीर में हल्कापन, कार्य करने का उत्साह बढ़ता है। शरीर की बेटरी चार्ज हो जाती है । चिन्ता, भय , निराशा, अनिद्रा, दुर्बलता, आलस्य आदि दूर होकर व्यक्ति सजग एवम् अप्रमादी बनने लगता है। अपने आपको पहचानने लगता है। आत्मावलोकन करने लगता है। यही तो आत्मा से परमात्मा बनने की कला होती है।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।


present form of yoga 2021 योग का वर्तमान स्वरूप






30 July 2020

Swar Vigyan Hindi7 - चिकित्सा में स्वरों की प्रयोग विधी , पंचमहाभूतों का स्वर पर प्रभाव

चिकित्सा में स्वरों की प्रयोग विधी

पंचमहाभूतों का स्वर पर प्रभाव




चिकित्सा में स्वरों की प्रयोग विधी :

  1.  गर्मी सम्बन्धी रोग :- गर्मी, प्यास, बुखार, पीत्त सम्बन्धी रोगों में चन्द्र स्वर चलाने से शरीर में शीतलता बढ़ती है, जिससे गर्मी से उत्पन्न असंतुलन दूर हो जाता है।

  2.  कफ सम्बन्धी रोग:- सर्दी, जुकाम, खांसी, दमा आदि कफ सम्बन्धी रोगों में सूर्य स्वर अधिकाधिक चलाने से शरीर में गर्मी बढ़ती है। सर्दी का प्रभाव दूर होता है।

  3. आकस्मिक रोग:-

प्रत्येक व्यक्ति को स्वर में होने वाले परिवर्तनों का नियमित आंकलन और समीक्षा करनी चाहिये। दिन-रात 12 घंटे चन्द्र और 12 घंटे सूर्य स्वर चलना संतुलित स्वास्थ्य का सूचक होता है।

यदि एक स्वर ज्यादा और दूसरा स्वर कम चले तो शरीर में असंतुलन की स्थिति बनने से रोग होने की संभावना रहती है। हम स्वर के अनुकूल जितनी ज्यादा प्रवृत्तियां करेंगे, उतनी अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक लाभ अर्जित कर सकेंगे।

स्वरोदय विज्ञान के अनुसार व्यक्ति प्रातः निद्रा त्यागते समय अपना स्वर देखें। जो स्वर चल रहा है, धरती पर पहले वही पैर रखे। बाहर अथवा यात्रा में जाते समय पहले वह पैर आगे बढ़ावे, जिस तरफ का स्वर चल रहा है। साक्षात्कार के समय इस प्रकार बैठे की साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति बंद स्वर की तरफ हो, तो सभी कार्यों में इच्छित सफलता अवश्य मिलती है।


पंचमहाभूतों का स्वर पर प्रभाव :

पंच महाभूत तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) तथा ज्योतिष के नव ग्रह की स्थिति का भी हमारे स्वर से प्रत्यक्ष-परोक्ष सम्बन्ध होता है। शरीर में प्रत्येक समय अलग-अलग तत्वों की सक्रियता होती है। शरीर की रसायानिक संरचना में भी पृथ्वी और जल तत्व का अनुपात अन्य तत्वों से अधिक होता है। सारी दवाईयां प्रायः इन्हीं दो तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है। इस लिए जब शरीर में पृथ्वी तत्त्व प्रभावी होता है, उस समय किया गया उपचार सर्वाधिक प्रभावशाली होता है। उससे कम जल तत्त्व की सक्रियता पर प्रभाव पड़ता है।


शरीर में किस समय कौनसा तत्त्व प्रभावी होता है, उनको निम्न प्रयोगों द्वारा मालूम किया जा सकता है।

विधि नं. 1

  1. यदि पीला रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में पृथ्वी तत्त्व प्रभावी होता है।
  2. यदि सफेद रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में जल तत्त्व प्रभावी होता है।
  3. यदि लाल रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में अग्नि तत्त्व प्रभावी होता है।
  4. यदि काला रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में वायु तत्त्व प्रभावी होता है।
  5. यदि मिश्रीत (अलग-अलग) रंग दिखाई दे तो उस समय शरीर में आकाश तत्त्व प्रभावी होता है।

विधी नं. 2

  1. जब मुख का स्वाद मधुर हो, उस समय पृथ्वी तत्त्व सक्रिय होता है।
  2. जब मुख का स्वाद कसैला हो, उस समय जल तत्त्व सक्रिय होता है।
  3. जब मुख का स्वाद तीखा हो, उस समय अग्नि तत्त्व सक्रिय होता है।
  4. जब मुख का स्वाद खट्टा हो, उस समय वायु तत्त्व सक्रिय होता है।
  5. जब मुख का स्वाद कड़वा हो, उस समय आकाश तत्त्व सक्रिय होता है।

विधि नं. 3

स्वच्छ दर्पण पर मुंह से श्वास छोड़ने पर (फूंक मारने पर) जो आकृति बनती है, वे उस समय शरीर में प्रभावी तत्व को इंगित करती है।

  1. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से चौकोर आकार बनता हो तो-पृथ्वी तत्व की प्रधानता

  2. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से त्रिकोण आकार बनता हो तो- अग्नि तत्व की प्रधानता

  3. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से अर्द्ध चंद्राकार आकार बनता हो तो- जल तत्व की प्रधानता

  4. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से वृताकार (गोल) आकार बनता हो तो-

  5. यदि मुंह से निकलने वाली वाष्प से मिश्रित आकार बनता हो तो- आकाश तत्व की प्रधानता

जिज्ञासु व्यक्ति अनुभवी स्वरशास्त्री से स्वरोदय विज्ञान का अवश्य गहन अध्ययन करें। क्योंकि स्वर विज्ञान से न केवल रोगों से बचा जा सकता है अपितु प्रकृति के अदृश्य रहस्यों का भी पता लगाया जा सकता है। मानव देह में स्वरोदय एक ऐसी आश्चर्यजनक, सरल, स्वावलम्बी, प्रभावशाली, बिना किसी खर्च वाली चमत्कारी प्रणाली होती है जिसका ज्ञान और सम्यक् पालना होने पर किसी भी सांसारिक कार्यों में असफलता की प्राय: संभावना नहीं रहती। स्वर विज्ञान के अनुसार प्रवृत्ति करने से साक्षात्कार में सफलता, भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास, सामने वाले व्यक्ति के अन्तरभावों को सहजता से समझा जा सकता है। जिससे प्रतिदिन उपस्थित होने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों से सहज बचा जा सकता है। अज्ञानवश स्वरोदय की जानकारी के अभाव से ही हम हमारी क्षमताओं से अनभिज्ञ होते हैं। रोगी बनते हैं तथा अपने कार्यों में असफल होते हैं। स्वरोदय विज्ञान प्रत्यक्ष फलदायक है, जिसको ठीक-ठीक लिपीबद्ध करना संभव नहीं। केवल जनसाधारण के उपयोग की कुछ मुख्य सैद्धान्तिक बातों की आंशिक और संक्षिप्त जानकारी ही यहां दी गई हैं।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।



29 July 2020

Swar Vigyan Hindi6 - स्वरों की पहचान - स्वर बदलने के नियम

स्वरों की पहचान - स्वर बदलने के नियम


स्वरों की पहचान :

नथूने के पास अपनी अंगुलियां रख श्वसन क्रिया का अनुभव करें। जिस समय जिस नथूने से श्वास प्रवाह होता है, उस समय उस स्वर की प्रमुखता होती है। बायें नथूने से श्वास चलने पर चन्द्र स्वर, दाहिने नथूने से श्वास चलने पर सूर्य स्वर तथा दोनों नथूने से श्वास चलने की स्थिति को सुषुम्ना स्वर का चलना कहते हैं। | स्वर को पहचानने का दूसरा तरीका है कि हम बारी-बारी से एक नथूना बंद कर दूसरे नथूने से श्वास लें और छोड़ें। जिस नथूने से श्वसन सरलता से होता है, उस समय उससे सम्बन्धित स्वर प्रभावी होता है।

स्वर बदलने के नियम :


अस्वभाविक अथवा प्रवृत्ति की आवश्यकता के विपरीत स्वर शरीर में अस्वस्थता का सूचक होता है। निम्न विधियों द्वारा स्वर को सरलतापूर्वक कृत्रिम ढंग से बदला जा सकता है, ताकि हमें जैसा कार्य करना हो उसके अनुरूप स्वर का संचालन कर प्रत्येक कार्य को सम्यक् प्रकार से पूर्ण क्षमता के साथ कर सकें।

  1.  जो स्वर चलता हो, उस नथून को अंगुलि से या अन्य किसी विधि द्वारा थोड़ी देर तक दबाये रखने से, विपरीत इच्छित स्वर चलने लगता है।

  2.  चालू स्वर वाले नथूने से पूरा श्वास ग्रहण कर, बंद नथूने से श्वास छोड़ने की क्रिया बार-बार करने से बंद स्वर चलने लगता है।

  3. जो स्वर चालू करना हो, शरीर में उसके विपरीत भाग की तरफ करवट लेकर सोने तथा सिर को जमीन से थोड़ा ऊपर रखने से इच्छित स्वर चलने लगता है।

  4. जिस तरफ का स्वर बंद करना हो उस तरफे की बगल में दबाव देने से चालू स्वर बंद हो जाता है तथा इसके विपरीत दूसरा स्वर चलने लगता है।

  5. जो स्वर बंद करना हो, उसी तरफ के पैरों पर दबाव देकर, थोड़ा झुक कर उसी तरफ खड़ा रहने से, उस तरफ का स्वर बंद हो जाता है।
  6. जो स्वर बंद करना हो, उधर गर्दन को घुमाकर ठोडी पर रखने से कुछ मिनटों में वह स्वर बंद हो जाता है।
  7. घी अथवा शहद जो भी बराबर पाचन हो सके पीने से चालू स्वर तुरंत बंद हो जाता है। परन्तु साधारण अवस्था में दूध या अन्य तरल पदार्थ पीने से भी स्वर बदली हो जाता है।

  8. लित स्वर में स्वच्छ रुई डालकर नथूने में अवरोध उत्पन्न करने से स्वर बदल जाता है।
  9. कपाल-भाति और नाड़ी शोधन प्राणायाम से सुषुम्ना स्वर चलने लगता है।

निरंतर चलते हुए सूर्य या चन्द्र स्वर के बदलने के सारे उपाय करने पर भी यदि स्वर न बदले तो रोग असाध्य होता है तथा उस व्यक्ति की मृत्यु समीप होती है। मृत्यु के उक्त लक्षण होने पर भी स्वर परिवर्तन का निरंतर अभ्यास किया जाय तो मृत्यु को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है।

वैसे तो शरीर में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर चलने की अवधि व्यक्ति की जीवनशैली और साधना पद्धति पर निर्भर करती है। परन्तु जनसाधारण में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर 24 घंटों में बराबर चलना अच्छे स्वास्थ्य का सूचक होता है। दोनों स्वरों में जितना ज्यादा असंतुलन होता है उतना ही व्यक्ति अस्वस्थ अथवा रोगी होता है। संक्रामक और असाध्य रोगों में यह अन्तर काफी बढ़ जाता है। लम्बे समय तक एक ही स्वर चलने पर व्यक्ति की मृत्यु शीघ्र होने की संभावना रहती है। इस लिए सजगता पूर्वक स्वर चलने की अवधि को समान कर असाध्य एवं संक्रामक रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। सजगता का मतलब जो स्वर कम चलता है उसको कृत्रिम तरिकों से अधिकाधिक चलाने का प्रयास किया जाए तथा जो स्वर ज्यादा चलता है, उसको कम चलाया जाये। कार्यों के अनुरूप स्वर का नियंत्रण और संचालन किया जाये।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।


28 July 2020

Thought On Health

Thought On Health In Hindi

Swar Vigyan Hindi5 - सुषुम्ना

सुषुम्ना



चन्द्र और सूर्य नाड़ी में जब श्वास का प्रवाह शांत हो जाता है तो सुषुम्ना में प्रवाहित होने लगता है। इस अवस्था में व्यक्ति की सुप्त शक्तियां सुव्यवस्थित रूप से जागृत होने लगती है। इस लिए वह समय अन्तर्मुखी साधना हेतु सर्वाधिक उपयुक्त होता है। व्यक्ति में अहम समाप्त होने लगता है। अहम और आत्मज्ञान उसी प्रकार एक साथ नहीं रहते, जैसे दिन के प्रकाश में अंधेरे का अस्तित्व नहीं रहता। अपने अहंकार को न्यूनतम करने का सबसे उत्तम उपाय सूर्य नाड़ी और चन्द्र नाड़ी के प्रवाह को संतुलित करना है। जिससे हमारे शरीर, मन और भावनायें कार्य के नये एवं परिष्कृत स्तरों में व्यवस्थित होने लगती है । चन्द्र और सूर्य नाड़ी का असंतुलन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करता है। जीवन में सक्रियता व निष्क्रियता में, इच्छा व अनिच्छा में, सुसुप्ति और जागृति में, पसंद और नापसंद में, प्रयत्न  और प्रयत्नहीनता में, पुरुषार्थ और पुरुषार्थ हीनता में विजय और पराजय में, चिन्तन और निश्चित्तता में तथा स्वछन्दता और अनुशासन में दृष्टिगोचर होता है।

ध्यान कब करें? ध्यान के लिए सर्वोत्तम। 


जब चन्द्र नाड़ी से सूर्य नाड़ी में प्रवाह बदलता है तो इस परिवर्तन के समय एक साम्य अथवा संतुलन की अवस्था आती है। उस समय प्राण ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होती है अर्थात् यों कहना चाहिये कि सुषुम्ना स्वर चलने लगता है। यह साम्य अवस्था मात्र थोड़ी देर के लिए ही होती है। यह समय ध्यान के लिए सर्वोत्तम होता है। ध्यान की सफलता के लिए प्राण ऊर्जा का सुषुम्ना में प्रवाह आवश्यक है। इस परिस्थिति में व्यक्ति न तो शारीरिक रूप से अत्यधिक क्रियाशील होता है और न ही मानसिक रूप से विचारों से अति विक्षिप्त । प्राणायाम एवं अन्य विधियों द्वारा इस अवस्था को अपनी इच्छानुसार प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि योग साधना में प्राणायाम को इतना महत्व दिया जाता है। प्राणायाम ध्यान हेतु ठोस आधार बनाता है। कपाल भाति प्राणायाम करने से सुषुम्ना स्वर शीघ्र चलने लगता है।


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।



25 July 2020

Swar Vigyan Hindi4 - स्वर द्वारा शरीर का ताप संतुलन

Swar Vigyan Hind4 - स्वर द्वारा शरीर का ताप संतुलन


Swar Vigyan Hind4 - स्वर द्वारा शरीर का ताप संतुलन


जब चन्द्र स्वर चलता है तो शरीर में गर्मी का प्रभाव घटने लगता है। इस लिए  गर्मी सम्बन्धित रोगों ओर  बुखार के समय चन्द्र स्वर को चलाया जाये तो बुखार शीघ्र ठीक हो सकता है। ठीक इसी प्रकार भूख के समय जठराग्नि, आरोग्य आपका भोग के समय कामाग्नि और क्रोध, उत्तेजना के समय प्रायः मानसिक गर्मी अधिक होती है। इस लिए   ऐसे समय चन्द्र स्वर को सक्रिय रखा जावे तो उन पर सहजता से नियंत्रण पाया जा सकता है।

शरीर में होने वाले जैविक रासायनिक परिवर्तन जो कभी शांत और स्थिर होते हैं तो कभी तीव्र और उग्र भी होते हैं। जब शरीर में तापीय असंतुलन होता है तो शरीर में रोग होने लगते हैं। इस लिए  यह प्रत्येक व्यक्ति के स्वविवेक पर निर्भर करता है कि उसके शरीर में कितना तापीय असंतुलन है और उसके अनुरूप अपने स्वरों का संचालन कर अपने आपको स्वस्थ रखें। जब दोनों स्वर बराबर चलते हैं शरीर की आवश्यकता के अनुरूप चलते हैं तब ही व्यक्ति स्वस्थ रहता है।

दिन में सूर्य के प्रकाश और गर्मी के कारण सामान्यतः शरीर में भी गर्मी अधिक रहती हैं। इस लिए  सूर्य स्वर से सम्बन्धित कार्य करने के अलावा जितना ज्यादा चन्द्र स्वर सक्रिय होगा उतना स्वास्थ्य अच्छा होता है। इसी प्रकार रात्रि में दिन की अपेक्षा ठण्डक ज्यादा रहती है। चांदनी रात्रि में इसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। श्रम की कमी अथवा निद्रा के कारण भी शरीर में निष्क्रियता रहती है। इस लिए  उसको संतुलित रखने के लिए सूर्य स्वर को अधिक चलाना चाहिए। इसी कारण जिन व्यक्तियों के दिन में चन्द्र स्वर और रात में सूर्य स्वर स्वभाविक रूप से अधिक चलता है वे मानव दीर्घायु होते हैं।

चन्द्र और सूर्य नाड़ी का असंतुलन ही थकावट, चिंता तथा अन्य रोगों को जन्म देता है। इस लिए  दोनों का संतुलन और सामन्जस्य स्वस्थता हेतु अनिवार्य हैं। चन्द्र नाड़ी का मार्ग निवृत्ति का मार्ग है, परन्तु उस पर चलने से पूर्व सही सकारात्मक सोच आवश्यक है। इसी कारण पातंजली योग और कर्म निर्जरा के भेदों में ध्यान से पूर्व स्वाध्याय की साधना पर जोर दिया गया है। स्वाध्याय के अभाव में नकारात्मक निवृत्ति का मार्ग हानिकारक और भटकाने वाला हो सकता है। आध्यात्मिक साधकों को चन्द्र नाड़ी की क्रियाशीलता का विशेष ध्यान रखना चाहिये।

लम्बे समय तक रात्रि में लगातार चन्द्र स्वर चलना और दिन में सूर्य स्वर चलना, रोगी की अशुभ स्थिति का सूचक होता है और उसकी आयुष्य चन्द मास ही शेष रहती है।

सूर्य नाड़ी का कार्य प्रवृत्ति का मार्ग है। यह वह मार्ग हैं जहां अन्तर्जगत गौण होता है। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत लाभ तथा महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु कठिन परिश्रम करता है। कामनाओं और वासनाओं की पूर्ति हेतु प्रयलशील होता है। इसमें चेतना अत्यधिक बहिर्मुखी होती है। इस लिए ऐसे व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर सफलता पूर्वक आगे नहीं बढ़ पाते।

चन्द्र और सूर्य नाड़ी के क्रमशः प्रवाहित होते रहने के कारण ही व्यक्ति उच्च सजगता में प्रवेश नहीं कर पाता। जब तक ये क्रियाशील रहती है, योगाभ्यास में अधिक प्रगति नहीं हो सकती। जिस क्षण ये दोनों शांत होकर सुषुम्ना के केन्द्र बिंदु पर आ जाती है, तभी सुषुम्ना की शक्ति जागृत होती है और वहीं से अंतर्मुखी ध्यान का प्रारम्भ होता


सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सभी शांत, प्रसन्न, स्वस्थ एवं रोग मुक्त हों।